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कभी दहाड़ते थे बाघ, अब इंतजार में है जंगल के राजा!

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Kohramlive : झारखंड के घने साल जंगलों के बीच जब कभी शाम उतरती थी, तो बेटला के जंगलों में बाघों की दहाड़ गूंजती थी। जंगल सफारी पर निकले पर्यटक एक झलक पाने को घंटों इंतजार करते थे। वन्यजीव प्रेमियों के लिये पलामू टाइगर रिजर्व किसी रोमांचक सपने से कम नहीं था। लेकिन वक्त बदला और जंगल का राजा जैसे इस वनभूमि से रूठ गया। आज भी जब कोई बेटला नेशनल पार्क का नाम लेता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है, आखिर बाघ गये कहां? और क्या कभी फिर बेटला के जंगलों में उनकी दहाड़ सुनाई देगी?

देश के पहले टाइगर रिजर्व में था पलामू का नाम

साल 1973 में जब भारत सरकार ने बाघों के संरक्षण के लिये ऐतिहासिक ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू किया था, तब पलामू टाइगर रिजर्व को देश के पहले नौ टाइगर रिजर्व में शामिल किया गया था। यह झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिये गौरव की बात थी। उस दौर में पलामू के जंगल बाघों की अच्छी आबादी के लिये जाने जाते थे। बेटला नेशनल पार्क पर्यटकों, शोधकर्ताओं और वन्यजीव फोटोग्राफरों का पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था।

आखिर क्यों कम होते गये बाघ?

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार बेटला से बाघों के गायब होने के पीछे कई कारण रहे। सबसे बड़ा कारण अवैध शिकार माना जाता है। इसके अलावा जंगलों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप, वन क्षेत्रों पर दबाव और बाघों के लिये जरूरी शिकार प्रजातियों की घटती संख्या ने भी उनकी मौजूदगी को प्रभावित किया। जंगल में यदि हिरण, सांभर और अन्य शिकार प्रजातियां पर्याप्त नहीं होंगी, तो बाघों का टिके रहना मुश्किल हो जाता है। यही स्थिति धीरे-धीरे पलामू के जंगलों में भी देखने को मिली। वहीं, पलामू टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा वर्षों तक नक्सल गतिविधियों से प्रभावित रहा। इस कारण वन विभाग की नियमित निगरानी, गश्ती अभियान और संरक्षण कार्य बाधित हुये। कई इलाकों में वन कर्मियों की पहुंच सीमित हो गई थी। इसका असर सिर्फ बाघों पर ही नहीं, बल्कि पूरे वन्यजीव संरक्षण तंत्र पर पड़ा।

जंगल अब भी है वन्यजीवों से आबाद

हालांकि बाघों की संख्या को लेकर चिंता बनी हुई है, लेकिन बेटला के जंगल आज भी वन्यजीवों से समृद्ध हैं। यहां हाथियों के झुंड, तेंदुए, हिरण, सांभर, जंगली सूअर और कई दुर्लभ पक्षी प्रजातियां देखी जा सकती हैं। यही वजह है कि बेटला आज भी झारखंड के प्रमुख इको-टूरिज्म स्थलों में गिना जाता है। वन विभाग लगातार कैमरा ट्रैप, जंगल गश्त, वन्यजीव निगरानी और संरक्षण कार्यक्रम चला रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जंगलों की सुरक्षा, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने और वन्यजीव संरक्षण पर लगातार काम जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में पलामू फिर बाघों के लिये सुरक्षित ठिकाना बन सकता है।

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