छपरा : रिश्ता तय होते ही रबिंदर और नेहा में फोन पर गुफ्तगू शुरू हो गयी। ऐसा कोई दिन नहीं होता जब दोनों एक दूसरे से गुटरगूं ना करते हो। दोनों परिवार इससे अनजान थे। अचानक एक दिन रबिंदर ने यह जाना और सुना कि उनके घरवाले खासकर पिता नाराज़ और दुखी हैं। मामला लेन-देन यानि दहेज को लेकर लटकने लगा। रिश्ता टूटने के करीब पहुंच गया। यह सुन रबिंदर की सांस अटकने लगी। उधर नेहा भी बेचैन और परेशान थी।
दोनों एक-दूसरे को बेइंतहा चाहने लगे थे। दोनों में प्यार हो गया। तब नेहा की एक पुकार पर रबिंदर भागा-भागा अकेले उसके घर पहुंच गया। उसने नेहा के घरवालों से सिर्फ इतना ही कहा कि वह नेहा से ही शादी करेगा और अपने रूठे परिवार को बहुत जल्द मना लेगा। यह बात नेहा के पूरे गांव में फैल गयी। रबिंदर की दीवानगी और सच्चे प्यार के आगे नेहा का परिवार झुक गया। जमाने ने भी उसका साथ दिया। गांव के कुछ सम्मानित और बड़े बुजुर्ग की पहल पर दोनों की शादी एक मंदिर में करा दी गयी। तब एक बुजुर्ग ने चुटकी भरे अंदाज में सिर्फ इतना कहा कि मियां-बीवी राजी तो क्या करे काजी.. अगर पिता खुश होते तो नवंबर में होती रबिंदर की शादी। यह वाक्या छपरा का है। 25 साल का रबिंदर प्राइवेट जॉब करता है। उसे यकीन है कि वह नेहा को खुशहाल जिंदगी दे सकता है। वहीं 23 साल की नेहा रबिंदर को पाकर बेहद खुश है। दहेज को तिलांजलि देकर रबिंदर हीरो बन गया।
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