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अब दुनिया में चमकेगा आदिवासी कला और हस्तशिल्प का नाम, मिला GI टैग…

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Ranchi : झारखंड की मिट्टी में रची-बसी कला, परंपरा और आदिवासी संस्कृति अब केवल गांवों और मेलों तक सीमित नहीं रहेगी। राज्य के पारंपरिक उत्पादों को वह सम्मान मिलने लगा है, जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से की जा रही थी। सोहराय पेंटिंग के बाद अब झारखंड के 11 और विशिष्ट उत्पादों को GI (भौगोलिक संकेतक) टैग मिलने से राज्य की सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती मिली है। यह उपलब्धि हजारों कारीगरों, बुनकरों और शिल्पियों के भविष्य में नई रोशनी लेकर आई है। इनमें से चार उत्पादों को GI टैग दिलाने में नाबार्ड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

अब इन उत्पादों पर होगा झारखंड का अधिकार

GI टैग प्राप्त करने वाले उत्पादों में राज्य की समृद्ध कला और हस्तशिल्प की झलक दिखाई देती है। इनमें भगैया साड़ी और फैब्रिक, कुचाई सिल्क साड़ी, दुमका चादर, तसर सिल्क और साड़ियां, पांची साड़ी और फैब्रिक,झारखंड के पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पाद, केसरिया कलाकंद (कोडरमा), डोकरा क्राफ्ट, बडोनी पपेट्स, मुंडा ज्वेलरी, झारखंड बांस शिल्प (बैंबू क्राफ्ट), जादोपटिया पेंटिंग शामिल हैं। इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान अब कानूनी रूप से सुरक्षित होगी।

आदिवासी विरासत को मिलेगा नया जीवन

वर्षों पुरानी आदिवासी कला और पारंपरिक कारीगरी अब नई पहचान के साथ देश-दुनिया के बाजार तक पहुंच सकेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने से इन उत्पादों की पारंपरिक तकनीक और निर्माण विधियां संरक्षित रहेंगी। वहीं, नई पीढ़ी भी इन कलाओं को अपनाने के लिये प्रेरित होगी।

सोहराय ने खोला था रास्ता

झारखंड में सबसे पहले सोहराय पेंटिंग को 14 सितंबर 2021 को GI टैग मिला था। आदिवासी संस्कृति की इस अनमोल धरोहर ने देशभर में झारखंड की कला को नई पहचान दिलाई थी। अब अन्य उत्पादों के जुड़ने से राज्य की सांस्कृतिक ताकत और मजबूत हो गई है।

पांच और उत्पाद कतार में

झारक्राफ्ट ने राज्य के पांच अन्य विशिष्ट उत्पादों को भी GI टैग दिलाने की प्रक्रिया शुरू कर रखी है। इनमें सरायकेला-कुचाई हल्दी, सिमडेगा की मीठी इमली, सिमडेगा का बिरू गमछा एवं अन्य पारंपरिक उत्पाद शामिल हैं।  इनमें से कई उत्पाद अंतिम चरण की जांच प्रक्रिया में हैं। मंजूरी मिलने पर झारखंड की सूची और लंबी हो जायेगी।

कारीगरों की आय बढ़ाने में मिलेगी मदद

GI टैग केवल पहचान का प्रतीक नहीं होता, बल्कि यह आर्थिक सशक्तिकरण का भी माध्यम है। इससे स्थानीय उत्पादों की ब्रांड वैल्यू बढ़ती है और उन्हें बाजार में बेहतर कीमत मिलती है। नकली उत्पादों पर रोक लगती है और असली उत्पाद बनाने वाले कारीगरों को सीधा लाभ मिलता है। मुंडा ज्वेलरी, डोकरा कला और तसर सिल्क जैसे उत्पाद अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मजबूती से अपनी जगह बना सकेंगे।

यह होता है GI टैग

GI यानी भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) एक विशेष पहचान है, जो किसी उत्पाद को उसकी विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति और गुणवत्ता के आधार पर दी जाती है। यह एक बौद्धिक संपदा अधिकार है, जो उत्पाद की मौलिकता और प्रतिष्ठा की रक्षा करता है। इससे कोई अन्य व्यक्ति या संस्था उस नाम का गलत इस्तेमाल नहीं कर सकती। यह टैग आमतौर पर 10 वर्षों के लिए मान्य होता है और समय-समय पर इसका नवीनीकरण कराया जाता है। झारखंड की कला, संस्कृति और शिल्प सदियों से अपनी विशिष्ट पहचान रखते आये हैं। लेकिन अब उन्हें कानूनी मान्यता और वैश्विक पहचान भी मिलने लगी है।

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