West Bengal : कभी ममता बनर्जी की सियासी फौज माने जाने वाले सांसदों का एक बड़ा कुनबा अब अलग राह पर निकल पड़ा है। बंगाल की राजनीति में उठी बगावत की चिंगारी अब दिल्ली की संसद तक पहुंच गई है। TMC (तृणमूल कांग्रेस) के बागी सांसदों ने ऐसा दांव चला है, जिसने दीदी के राजनीतिक किले की नींव तक हिला दी है। राजधानी दिल्ली में उस समय सियासी हलचल तेज हो गई, जब TMC के बागी सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिलने पहुंचा। सांसदों ने सदन में अलग बैठने की मांग रखी, वहीं, खुद को असली TMC विधायी समूह बताने का दावा भी ठोक दिया।
“हम 20 हैं, दो-तिहाई से ज्यादा हैं” : काकोली घोष
बगावत की अगुवाई कर रहीं सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने मुलाकात के बाद बड़ा एलान करते हुये मीडिया से कहा कि उनके साथ 20 सांसद हैं, जो TMC के कुल सांसदों की संख्या के दो-तिहाई से अधिक हैं। उन्होंने घोषणा की कि उनका गुट अब नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी (NCPI) में विलय कर रहा है और आगे प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले NDA के साथ काम करेगा। स्पीकर से मुलाकात से पहले बागी सांसदों की भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी रणनीतिक बैठक हुई। इसके बाद सियासी गलियारों में अटकलों का बाजार और गर्म हो गया। राजनीतिक जानकार इसे पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले कई वर्षों की सबसे बड़ी टूट मान रहे हैं।
क्या है NCPI, जिसमें हुआ विलय?
नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) अपेक्षाकृत छोटी लेकिन मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी मानी जाती है। बागी सांसदों ने इसी पार्टी का दामन थामकर दलबदल विरोधी कानून की जटिलताओं से निकलने की रणनीति अपनाई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पूरी तरह कानूनी और संसदीय गणित को ध्यान में रखकर उठाया गया है।
ममता कैंप का पलटवार, स्पीकर को भेजा पत्र
उधर, ममता बनर्जी खेमे ने भी मोर्चा खोल दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर बागी सांसदों को किसी अलग समूह के रूप में मान्यता नहीं देने की मांग की है। TMC का दावा है कि पार्टी का असली नेतृत्व और अधिकार उनके पास ही है। इस बीच सियासी जानकारों का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ सांसदों की संख्या की नहीं, बल्कि तृणमूल कांग्रेस की असली पहचान की भी है। बागी गुट संकेत दे चुका है कि आगे चलकर वह पार्टी के नाम और राजनीतिक विरासत पर भी दावा ठोक सकता है। बंगाल की राजनीति में उठे इस तूफान का असर आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़क तक दिखाई दे सकता है। फिलहाल सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के फैसले और आगे की कानूनी लड़ाई पर टिकी हैं। हालांकि इस घटनाक्रम पर अंतिम संवैधानिक स्थिति अभी तय नहीं हुई है। बागी सांसदों के दावों और TMC नेतृत्व के विरोध के बीच फैसला संसदीय और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।
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