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2 लाख का इनामी खूंखार उग्रवादी जब 10 साल जेल खटकर आया तो देखिये क्या बोल गया…

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तीखी चोट खाकर थक गये अरमान मार्शल टूटी और पंकज पुर्ति के

रांची (राजेश/रूपम) : जैसा बोलते हैं, वैसा कुछ होता नहीं। बड़े-बड़े वादे, पर निभाता कोई नहीं। जब सोचते हैं तो मन खराब हो जाता है। पुराने कुछ साथियों की बातें याद आने लगती हैं। मना करते थे न, सुना नहीं। डाल दिया हथियार और चला गया जेल। बदले में क्या मिला? अंदर और बाहर की दुनिया में सिर्फ एक फर्क नजर आता है कि बाहर साथ में परिवार है और संगी-साथी से खुल कर बतिया लेते हैं। बोल सकते हैं-बंद जेल से बेहतर खुली जेल। चाहिये कि जो बोल कर सरेंडर कराते हैं, उसको पूरा करें। झांक लीजिए असम को। वहां हथियार डालने वाले को पुलिस बल में नौकरी मिल जाती है। यहां नौकरी तो दूर, किये वादे भी पूरे नहीं होते। बोला गया था कि बच्चे की पढ़ाई-लिखाई मुफ्त होगी, जमीन देंगे, फ्लैट बना देंगे। यह सबकुछ सिर्फ कहने की बातें। सिर्फ हथियार डालते वक्त ढाई लाख रुपया मिला था। मेरा मुड़ी में तो सरकार इनाम रखा था 2 लाख। यह काम घर वाला करता तो उसको भी मिल जाता रुपया। खैर, हम तो सिर्फ इतना ही कहेंगे कि बीहड़ों से चल कर आने वाले को गला लगाना सीखे सरकार। उसको भी रोजी-रोटी दे, जीने का मौका दे, ताकि उसका भी परिवार चलता रहे। ऐसे कई साथी हैं, जिसको यह बोलते सुने है कि इससे बेहतर तो जंगली जीवन ही था। पहले दुश्मन की संख्या एक थी, हथियार डालने के बाद तो बढ़ गये दुश्मन। कभी-कभी मन किचकिचाता है। देखिए उग्रवादी साथी अजय पूर्ति का हाल। पत्नी के प्यार ने उसे सरेंडर कराया। अब बाहर आया है तो वह पत्नी का एक भी सपना पूरा करने के लायक नहीं है। उल्टे 10 गो दुश्मन। पूछिएगा उसी से। बताएगा अपनी रामकहानी। यह कहना है सरेंडर कर 10 साल जेल में बिताने के बाद बाहर निकले मार्शल टूटी का।

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मार्शल टूटी, मजबूत कद काठी, गठा हुआ शरीर और चेहरे पर कुटिल मुस्कान। वह जब बीहड़ों में हथियार थाम चलता था, तो हर कदम पर दस्ते के साथी हो जाते थे चौकन्ना। जंगल में बिखरे सूखे पत्तों को मसलती भारी बूटों की आवाज को वह बखूबी पहचान लेता था। मुख से हौले से निकलता था-साथी अलर्ट, सावधान, पोजीशन। पुलिस आ रही है। कई बार सीधी मुठभेड़ हुई। जंगल के चप्पे-चप्पे से वाकिफ होने के कारण बड़े आराम से पुलिस को गुमराह कर देता था। कई बार तो ऐसा हुआ कि बगल से गुजर जाती थी पुलिस, पता ही नहीं चलता था कि जिसे अभी-अभी रोका-टोका, उसकी खोज में ही छान मार रहा है जंगल। नेटवर्क ऐसा कि थाना के बाहर भी पत्ता हिलता है तो उसकी खड़क बीहड़ों तक सुनाई पड़ जाती है। जंगल की जिंदगी थोड़ी दुखदायी तो है, उबाऊ नहीं।

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समाज में जब बहुत करीब से गरीब को रोते, चीखते, चिल्लाते देखे तो मन में हिलोर मार गया। कोई इन गरीबों का दुख-दर्द दूर करने और सुनने वाला तक नहीं। बस यही सोच 2000 में खींच ले गया मार्शल टूटी को जंगल की ओर। देखते ही देखते उग्रवादी संगठन में बड़ा ओहदा मिला और सरकार ने सिर पर पूरे 2 लाख रुपये इनाम रख दिये। कुछ लोगों की सलाह पर सरेंडर कर जेल चले गये। जेल से बाहर निकले तो परिवार का हाल देख मन दुखी हो गया। खाने पीने से लेकर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तक का वादा भूल गयी सरकार। सरकार का कोई भी लाभ परिवार को नहीं मिल रहा। कारण कोई कार्ड ही नहीं बनता, जैसे राशन, पैन, आधार लंद-फंद। कभी-कभी तो मन इतना खिसिया जाता है कि लगता है कि फिर से थाम लें हथियार और लौट जायें पुराने संगी-साथी के पास जंगल

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