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नेमरा से संसद तक, संघर्ष की गाथा को मिला पद्म भूषण…

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Shibu Soren Padma Bhushan : यह सिर्फ एक सम्मान नहीं, बल्कि उस लंबे संघर्ष, त्याग और जनआंदोलन की राष्ट्रीय स्वीकृति है, जिसने झारखंड की पहचान गढ़ी। झारखंड आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार, आदिवासी अस्मिता के प्रखर स्वर और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। मंगलवार को संसद भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान शिबू सोरेन की धर्मपत्नी रूपी सोरेन को प्रदान किया। इस भावुक क्षण के दौरान परिवार के सदस्य, जिनमें कल्पना सोरेन और अंजनी सोरेन भी शामिल थीं, मौजूद रहे। यह सम्मान आदिवासी समाज के उत्थान, झारखंड आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका और सार्वजनिक जीवन में उनके असाधारण योगदान के लिये प्रदान किया गया है।

नेमरा के शिवलाल से ‘दिशोम गुरु’ बनने तक का सफर

11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन का बचपन संघर्षों के बीच बीता। उनका शुरुआती नाम शिवलाल था, लेकिन समय के साथ वे शिबू सोरेन और फिर पूरे झारखंड के लिये ‘दिशोम गुरु’ बन गये। उनके पिता सोबरन सोरेन शिक्षक और गांधीवादी विचारों के समर्थक थे। वर्ष 1957 में महाजनों के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से उनकी हत्या कर दी गई। पिता की हत्या ने किशोर शिबू के मन पर गहरा असर डाला और यहीं से अन्याय के खिलाफ उनके संघर्ष की शुरुआत हुई।

महाजनों के खिलाफ आंदोलन से बनी पहचान

युवा शिबू सोरेन ने आदिवासियों और वंचित समुदायों को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने संताल नवयुवक संघ और सोनोत संताल समाज जैसे संगठनों के माध्यम से सामाजिक चेतना जगाई। धनकटनी आंदोलन ने उन्हें ग्रामीण और आदिवासी समाज में नई पहचान दिलाई। पारसनाथ की पहाड़ियों से लेकर टुंडी और संताल परगना तक उनका आंदोलन फैलता गया। वे केवल विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि समाज को आत्मनिर्भर बनाने का भी प्रयास कर रहे थे। टुंडी क्षेत्र में उन्होंने सामूहिक खेती, पशुपालन और रात्रि पाठशालाओं की शुरुआत कर सामाजिक परिवर्तन की मिसाल पेश की। स्थानीय विवादों के समाधान और ग्रामीण विकास के प्रयासों ने उन्हें जनता के बीच असाधारण लोकप्रियता दिलाई। यहीं से लोग उन्हें सम्मानपूर्वक ‘दिशोम गुरु’ यानी ‘देश का गुरु’ कहकर पुकारने लगे।

झारखंड आंदोलन को जनआंदोलन में बदलने वाले नेता

वर्ष 1973 में शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और एके राय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे लाखों लोगों की आवाज बन गया। आपातकाल के दौरान जेल जाना पड़ा, चुनावी हार भी मिली, लेकिन संघर्ष नहीं रुका।

सांसद से मुख्यमंत्री तक का सफर

1980 में दुमका से पहली बार लोकसभा पहुंचे शिबू सोरेन ने राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बनाई। 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद उन्होंने झामुमो की कमान संभाली और पार्टी को नई दिशा दी। झारखंड राज्य के गठन के बाद उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाला। पहली बार 2005 में मुख्यमंत्री बने। दूसरी बार 2008 में मुख्यमंत्री बने। तीसरी बार 2009 में राज्य की कमान संभाली। राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद उनका जनाधार लगातार मजबूत बना रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में देशभर में भाजपा की लहर के बीच भी शिबू सोरेन दुमका से सांसद चुने गये। 2019 में चुनाव हारने के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया, जहां उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड की आवाज बुलंद की। 15 अप्रैल 2025 को झामुमो के महाधिवेशन में उन्होंने संगठन की बागडोर नई पीढ़ी को सौंपते हुये हेमंत सोरेन को पार्टी अध्यक्ष बनाया और स्वयं संस्थापक संरक्षक की भूमिका में आ गये।

एक युग का अंत, लेकिन विचार अमर

4 अगस्त 2025 को नई दिल्ली स्थित Sir Ganga Ram Hospital में 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके जाने के साथ झारखंड आंदोलन और आदिवासी राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं। शिबू सोरेन का जीवन सत्ता की राजनीति से कहीं बड़ा था। वह जल, जंगल, जमीन और आदिवासी पहचान की लड़ाई का प्रतीक थे। उन्होंने उन लोगों की आवाज को मंच दिया, जो दशकों तक हाशिये पर रहे। आज पद्म भूषण सम्मान के रूप में राष्ट्र ने उस संघर्ष को सलाम किया है, जो नेमरा के एक साधारण घर से शुरू होकर पूरे देश की चेतना का हिस्सा बन गया। दिशोम गुरु अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन झारखंड की मिट्टी में उनकी आवाज, उनके संघर्ष और उनके सपनों की गूंज हमेशा सुनाई देती रहेगी।

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