Kohramlive : कभी-कभी जिंदगी ऐसी कहानी लिखती है, जिसे पढ़कर आखों में आंसू छलक आते हैं। यह कहानी एक ऐसे पिता की है, जिसने अपनों को खो दिया था, घर का रास्ता भूल गया था, लेकिन उम्मीद का एक धागा कभी नहीं टूटा। और फिर एक दिन मोबाइल स्क्रीन पर बेटे का चेहरा दिखाई दिया, बस, वहीं से जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया। कर्नाटक के मंगलुरु से सामने आई यह कहानी 62 साल के पुरुषोत्तम की है, जो करीब सात साल तक अपने परिवार से बिछड़े रहे। कभी साहित्य लिखने और सपने देखने वाला यह शख्स मानसिक तनाव, अवसाद और शराब की लत के कारण सड़कों पर आ गया था। लेकिन एक व्हाट्सऐप वीडियो कॉल ने उसे फिर से परिवार की गोद में पहुंचा दिया।
जिसके सपनों को निगल गया तनाव
उत्तर कन्नड़ जिले के होन्नावर के रहने वाले पुरुषोत्तम पढ़े-लिखे और संवेदनशील इंसान थे। कॉलेज के दिनों से ही उन्हें साहित्य से लगाव था। कविताएं लिखना, लेख भेजना और समाज से जुड़े मुद्दों पर सोच-विचार करना उनकी आदत थी। BA की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई नौकरियां कीं। कुछ समय होमगार्ड रहे और बाद में मंगलुरु के एक निजी अस्पताल में काम करने लगे। लेकिन यहीं से उनकी जिंदगी ने करवट लेनी शुरू कर दी। अस्पताल में पुरुषोत्तम को ICU विभाग के साथ-साथ मृत मरीजों के शवों की देखरेख की जिम्मेदारी भी मिली थी। रोजाना मौत, दर्द, रोते परिजन और लाशों के बीच काम करते-करते उनका मन टूटने लगा। मानसिक तनाव धीरे-धीरे अवसाद में बदल गया। दर्द से राहत पाने के लिये उन्होंने शराब का सहारा लिया, लेकिन शराब ने उनकी जिंदगी को और गहरे अंधेरे में धकेल दिया।
घर छूटा, रिश्ते बिखरे और सड़क बन गई ठिकाना
शराब की लत बढ़ती गई तो व्यवहार भी बदलने लगा। परिवार के साथ रिश्तों में दरार आने लगी। पत्नी, बेटे और रिश्तेदारों से दूरियां बढ़ती चली गईं। आखिरकार एक दिन ऐसा आया जब पुरुषोत्तम घर छोड़कर चले गये। जो व्यक्ति कभी लेख और कविताएं लिखा करता था, वह अब सड़कों पर बेसहारा जिंदगी गुजारने लगा। 12 नवंबर 2019 को मंगलुरु के ओशन पर्ल होटल के पास एक बीमार और असहाय व्यक्ति के पड़े होने की सूचना व्हाइट डव्स चैरिटेबल ट्रस्ट को मिली। संस्था की संस्थापक कोरिना रस्किन मौके पर पहुंचीं और पुरुषोत्तम को अपने सेंटर ले आईं। वहां उनका इलाज शुरू हुआ। नियमित देखभाल, दवाइयों और काउंसलिंग ने धीरे-धीरे उनकी हालत में सुधार लाना शुरू किया।
यादें लौटने लगीं, बेटे की याद सताने लगी
समय के साथ पुरुषोत्तम की याददाश्त भी लौटने लगी। उन्हें याद आया कि उनकी पत्नी का नाम सविता है। उनका एक बेटा है, नवीन। और कहीं एक घर है, जहां कभी वे अपने परिवार के साथ रहते थे। इसके बाद उनके दिल में सिर्फ एक इच्छा बची, एक बार अपने बेटे को देखने की। वह रोज बेटे के बारे में बात करते। कविताएं लिखते। चिट्ठियां लिखते। शब्दों के सहारे घर लौटने का सपना जिंदा रखते। व्हाइट डव्स संस्था ने परिवार को खोजने का अभियान शुरू किया। भाइयों और रिश्तेदारों से संपर्क हुआ, लेकिन शुरुआत में कोई भी उन्हें वापस लेने को तैयार नहीं था। पुराने जख्म और कड़वे अनुभव अभी भी परिवार के मन में ताजा थे। फिर भी संस्था ने हार नहीं मानी। लगातार एक साल तक कोशिशें जारी रहीं।
और फिर आया वो दिन…
आखिरकार संस्था ने पुरुषोत्तम के बेटे नवीन से व्हाट्सऐप वीडियो कॉल पर बात कराने की व्यवस्था कर दी। करीब सात साल बाद बेटे ने पहली बार अपने पिता को देखा। समय ने पिता का चेहरा बदल दिया था, लेकिन रिश्ते की पहचान नहीं बदली थी। वीडियो कॉल पर बेटे ने सिर्फ इतना कहा, “पापा, आप चिंता मत कीजिए, मैं यहां हूं।” यह सुनते ही पुरुषोत्तम की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उस वीडियो कॉल के बाद बेटे ने अपनी मां और परिवार के अन्य सदस्यों को समझाया। कुछ दिनों बाद पत्नी, बेटा, भाई और मां स्वयं व्हाइट डव्स सेंटर पहुंचे। सालों बाद हुये उस मिलन को देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं। जिस परिवार ने कभी उन्हें स्वीकारने से इनकार कर दिया था, वही परिवार अब उन्हें अपने साथ घर ले जाने आया था। घर लौटने की खुशी पुरुषोत्तम के चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी। उन्होंने भावुक होकर कहा, “सब कुछ खोने के बाद मुझे परिवार की कीमत समझ आई। मेरे बेटे, पत्नी और बड़े भाई ने मुझे फिर से अपना लिया है। यह मेरी जिंदगी का दूसरा जन्म है।”
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