Kohramlive : आपने सुपरमार्केट में खरीदारी करते समय ट्रॉली तो जरूर इस्तेमाल की होगी। लेकिन क्या कभी इस बात पर ध्यान दिया कि ट्रॉली का अगला हिस्सा बड़ा और पीछे का हिस्सा अपेक्षाकृत छोटा होता है? पहली नजर में यह सामान्य डिजाइन लग सकता है, लेकिन इसके पीछे इंजीनियरिंग, सुविधा और बेहतर प्रबंधन की सोच छिपी होती है। सुपरमार्केट की ट्रॉली का आगे बड़ा और पीछे छोटा होना महज एक डिजाइन नहीं, बल्कि स्मार्ट इंजीनियरिंग का बेहतरीन उदाहरण है। इससे कम जगह में ज्यादा ट्रॉलियां रखी जा सकती हैं, ग्राहकों की खरीदारी आसान होती है और स्टोर का संचालन अधिक व्यवस्थित बनता है। अगली बार जब आप ट्रॉली उठायें, तो उसके इस छोटे-से लेकिन बेहद उपयोगी डिजाइन को जरूर याद करें।
एक-दूसरे के अंदर आसानी से फिट हो जाती हैं ट्रॉलियांः ट्रॉली का अगला हिस्सा चौड़ा और पीछे का हिस्सा संकरा बनाया जाता है, ताकि एक ट्रॉली दूसरी के अंदर आसानी से चली जाये। इसे नेस्टिंग (Nesting) डिजाइन कहा जाता है। इसकी मदद से दर्जनों ट्रॉलियां बहुत कम जगह में व्यवस्थित रखी जा सकती हैं।
स्टोर की कीमती जगह बचती हैः अगर सभी ट्रॉलियां एक जैसी चौड़ाई की होतीं, तो उन्हें रखने के लिये काफी ज्यादा जगह की जरूरत पड़ती। नेस्टिंग डिजाइन सुपरमार्केट की जगह बचाता है और प्रवेश द्वार या बिलिंग एरिया पर भीड़भाड़ कम करने में मदद करता है।
ग्राहकों और कर्मचारियों दोनों के लिये आसानः इस खास डिजाइन की वजह से ग्राहक बिना ज्यादा मेहनत के एक ट्रॉली अलग निकाल सकते हैं। वहीं, स्टोर के कर्मचारी भी कई ट्रॉलियों को एक साथ व्यवस्थित तरीके से वापस उनकी जगह पर रख सकते हैं। इससे समय और मेहनत दोनों की बचत होती है।
सामान रखने में ज्यादा जगह, चलाने में बेहतर संतुलनः ट्रॉली का आगे का चौड़ा हिस्सा ज्यादा सामान रखने की सुविधा देता है, जबकि पीछे का हिस्सा हैंडल और पहियों के साथ बेहतर संतुलन बनाए रखता है। इससे ट्रॉली को धक्का देना आसान होता है और भारी सामान होने पर भी उसे नियंत्रित करना सुविधाजनक रहता है।
क्या सिर्फ भारत में ही ऐसा होता है?
बिल्कुल नहीं। दुनिया भर के अधिकांश बड़े सुपरमार्केट, हाइपरमार्केट और रिटेल स्टोर इसी तरह की ट्रॉलियों का इस्तेमाल करते हैं। यह डिजाइन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया एक प्रभावी और व्यावहारिक मानक है।
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