रांची : उस रोज यानी 24 मार्च 2018 की गुनगुनी धूप में जैसे ही सीएम रघुवर दास ने फीता काटा, वहां मौजूद हर किसी ने तालियां बजायीं और सबकी जुबां पर एक ही बोल-अब सबका खुलेगा किस्मत का ताला। गजब की खुशियां, जुनून, जज्बा और कुछ अलग करने की ललक। ये लोग घर लौटे तो जरूर, पर मन बेकरार था यहां इंट्री पाने को। सूत कताई, मधुमक्खी पालन, टेराकोटा और लाह की चूड़ियां बनाने का हुनर सिखाने का खुला था ट्रेनिंग सेंटर। बाहर बोर्ड टंगा खादी एवं ग्रामोद्योग उत्पादन और प्रशिक्षण केंद्र, सीताडीह, बरवादाग अनगड़ा, रांची। 47 सिलाई मशीन, 67 चरखे और मधुमक्खी पालने के लिए लाये गये बक्से।
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देखते ही देखते रजिस्टर में 150 जनों का नाम और पता दर्ज हो गया, जिन्होंने यहां ट्रेनिंग लेना शुरू किया। अफसोस दीप प्रज्ज्वलित होने के छह माह के अंदर ही लटक गया यहां ताला। ट्रेनी लोगों का दुख बस एक कि छह महीने की ट्रेनिंग देकर केवल तीन महीने का मिला स्टाइपेंड। प्रति माह मिलता था साढ़े चार हजार रुपया। सरकारी उदासीनता और अनदेखी के कारण लटका ट्रेनिंग सेंटर में ताला और बंद हो गया उस गांव के होनहार लोगों की किस्मत का पिटारा। अब एक ही आस कि कौन होगा उनका रहनुमा जो चाबी लेकर आये और यहां बंद पड़े ताले को खोले। अंदर झांकने पर वहां पड़े उपकरणों को देखने से यही झलकता है कि अब यह कोई डंपिंग यार्ड है। कई चेहरे ऐसे दिखे और बताये कि महज छह महीने की ट्रेनिंग में ही बहुत कुछ सीख लिया। कुछ लोग तो अब घर से ही बेचना शुरू कर दिया अपने हुनर को। किसी तरह गुजारा हो रहा है, पर मन है उदास। आइए सुनते हैं यहां ट्रेनिंग लेने वाले क्या कहते हैं।
कैमरामैन संजय कपरदार के साथ नंदनी और सत्य शरण मिश्र की रिपोर्ट।
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