Kohramlive : बचपन में बुजुर्गों से सुना था— “झूठ छुप नहीं सकता।” तब लोग चेहरे की शिकन, आवाज का उतार-चढ़ाव और पसीने की बूंदों से झूठ पकड़ लेते थे। लेकिन जनाब, वक्त बदल चुका है। अब विज्ञान ने ऐसे अचूक तरीके खोज निकाले हैं कि झूठ बोलने वाला चाहे जितना होशियार हो, पकड़ा जरूर जायेगा।
आवाज की थरथराहट से झूठ की पोल खुलती है
किसी ने आपसे कहा, “मैं सच बोल रहा हूँ!” लेकिन अगर उसकी आवाज में हल्का सा कंपन हो, बोलने की गति ऊपर-नीचे हो जाये, तो समझ लीजिये कि कुछ गड़बड़ है। वैज्ञानिकों ने साबित किया है कि झूठ बोलते समय आवाज के पैटर्न में बदलाव आ जाता है, जिसे मशीनें पकड़ सकती हैं।
जब झूठ की बत्ती जलती है
न्यूरोसाइंटिस्ट अब इंसान के दिमाग की तरंगों को पढ़कर सच और झूठ का फर्क कर सकते हैं। झूठ बोलते ही मस्तिष्क के कुछ खास हिस्से ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। खासकर दिमाग को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, क्योंकि उसे एक नई कहानी गढ़नी पड़ती है!
आंखें बोलती हैं— पुतलियों का राज
वैज्ञानिकों का दावा है कि झूठ बोलते समय आंखों की पुतलियां थोड़ी फैल जाती हैं। मतलब अगर कोई बात करते वक्त उसकी आंखें सामान्य से ज्यादा बड़ी हो जायें, तो आपके लिये इशारा साफ है— मामला संदिग्ध है।
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