कोहराम लाइव डेस्क: Transgender यानी न पूरा पुरुष, न पूरा स्त्री। समाज में एक अभिशाप जैसी जिंदगी। फिर भी यदि कुदरत ने ऐसी जिंदगी बख्शी है, तो इसमें ट्रांसजेंडर का क्या कसूर। उसके भी तो अरमान होते हैं। कुछ करने और दिखाने की उसकी भी तो तमन्ना होती है। उसके भी तो सपने होते हैं। हां, दर्दनाक हालात तब बनते हैं, जब अपने भी साथ नहीं देते हैं। ऐसी जिंदगी से तंग आकर कोई भी हताश हो सकता है, पर इरादों में हौसला हो, आगे बढ़ने के लिए कदमों में दम हो और वक्त साथ दे, तो कामयाबी के रास्ते निकल ही आते हैं।
कौन कहता है कि मंजिल पाना कठिन है। लगन हो तो मंजिल तो कदमों के पास चलकर खुद आती है। अंग्रेजी में भी कहा गया है- इफ देयर इज विल, देयर इज वे यानी जहां चाह, वहां राह। जी हां, हम बात कर रहे हैं केरल के त्रिशुर जिले के एक Transgender की। आइए, सुनते हैं उसकी कहानी, उसकी ही जुबानी।
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तब मेरी उम्र मात्र 19 साल थी
Pilot बनना बचपन से ही मेरा सपना था। मेरे घर वालों ने प्राइवेट पायलट का कोर्स करने के लिए मुझे जोहान्सबर्ग भेजा। घरवालों ने कर्ज लेकर स्काइलार्क एविएशन एकेडमी जोहान्सबर्ग में मेरा दाखिला करवाया था। वहां मैंने साल भर का कोर्स किया। जब मैं वहां से प्राइवेट पायलट का लाइसेंस लेकर लौटा, और यह खबर सुर्खियों में छपी, तो मेरे लिए मुश्किलें पैदा हो गईं।
मैंने कभी अपने घरवालों को नहीं बताया कि मैं ट्रांसजेंडर हूं, क्योंकि मेरे हाव-भाव और व्यवहार से वे सभी जानते थे। उसके बाद मेरे घर वालों ने मुझे लगभग एक साल तक घर में कैद करके रख दिया और मेरा मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न किया गया। मैं केरल के त्रिशुर जिले का रहने वाला हूं। तब मेरी उम्र मात्र उन्नीस साल थी।
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अपनी तरह का मैं अकेला व्यक्ति नहीं
इन सबसे परेशान होकर मुझे घर छोड़कर भागना पड़ा और भागकर मैं एर्नाकुलम चला गया, जहां सौभाग्य से मेरी मुलाकात अपने जैसे ही एक Transgender व्यक्ति से हुई। तब मुझे यह एहसास हुआ कि अपनी तरह का मैं अकेला व्यक्ति नहीं हूं, बल्कि और भी लोग हैं, जिन्हें अपनी पहचान के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। मेरे पास न रहने का ठिकाना था और न ही कोई सामान, इसलिए मैं रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड में कहीं भी सो जाता था।
मेरी कहानी मीडिया में सुर्खियों में हुई थी प्रकाशित
आजीविका कमाने के लिए मैं जूस की दुकान पर काम करने लगा। धीरे-धीरे मैंने कई एविएशन एकेडमी में अंशकालिक फैकल्टी के रूप में पढ़ाना शुरू कर दिया। लेकिन मेरी लैंगिक पहचान के कारण कोई भी मुझे अच्छा वेतन देने के लिए तैयार नहीं था। चूंकि मेरी कहानी मीडिया में सुर्खियों में प्रकाशित हुई थी, इसलिए सरकारी विभाग के लोगों की नजर में भी मैं आ गया था। एक दिन बाल कल्याण मंत्रालय की ओर से मेरे पास एक फोन आया और मुझे सुझाया गया कि मैं बेहतर जीवन और गरिमापूर्ण नौकरी के लिए सामाजिक न्याय विभाग का दरवाजा खटखटाऊं।
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पायलट बनने के लिए प्रोफेशनल लाइसेंस अनिवार्य
उसके बाद तो मेरी खुशी की सीमा ही नहीं रही। मैंने सामाजिक न्याय विभाग के सचिव से संपर्क किया। उन्होंने मुझे सुझाया कि मैं उच्च अध्ययन के लिए किसी बेहतर एविएशन एकेडमी में दखिला करवाऊं, ताकि मुझे व्यावसायिक विमान चालक का लाइसेंस मिल सके और मैं अपने सपने पूरे कर सकूं।
विमानों का पायलट बनने के लिए व्यावसायिक लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य होता है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय के नियमों के मुताबिक, अभ्यर्थी को दो हजार घंटे विमान उड़ाने का सबूत पेश करना पड़ता है।
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केरल सरकार ने दिए हैं 23 लाख रुपये
यह सुनकर मैं बहुत उत्साहित हुआ, लेकिन मेरे सामने सबसे बड़ी बाधा थी फीस की।
जब मैंने अपनी इस समस्या का उनसे जिक्र किया, तो उन्होंने मुझे सुझाया कि ट्रांसजेंडर जस्टिस बोर्ड के माध्यम से मैं प स्कॉलर शिप के लिए आवेदन करूं। मैंने उनके बताए अनुसार आवेदन कर दिया, जो स्वीकृत भी हो गया। केरल सरकार ने मुझे अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए 23 लाख से ज्यादा रुपये दिए हैं।
अगले कुछ ही हफ्तों में मैं राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एविएशन एंड टेक्नोलॉजी में दाखिला करवा कर प्रशिक्षण लेने वाला हूं। वहां तीन साल का कोर्स है। अगर मैंने यह कोर्स सफलतापूर्वक पूरा कर लिया, तो मैं देश का पहला Transgender पायलट बन जाऊंगा। मैं देश की सबसे बेहतरीन विमानन कंपनी में काम करना चाहता हूं। मैं अपनी तरह का पहला व्यक्ति बनना चाहता हूं, ताकि मेरे समुदाय के दूसरे लोग भी प्रेरणा लेकर आगे बढ़ सकें।
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इतना समझ लें कि आप अकेले नहीं हैं
Transgender समुदाय के अन्य लोगों के लिए मैं कहना चाहूंगा कि आप जो भी संघर्ष कर रहे हैं, निर्भयता पूर्वक करें, क्योंकि आपकी सहायता और आर्थिक मदद के लिए सरकार खड़ी है। और अगर कुछ नहीं हुआ, तो इतना समझ लें कि आप अकेले नहीं हैं।
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