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रांची का यह गांव हापतबेड़ा या आफतबेड़ा… देखें वीडियो

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Ranchi(Akhilesh Kumar) : झारखंड की राजधानी रांची से ज्यादा दूर नहीं, जोन्हा के समीप बसा एक गांव है हापतबेड़ा। कागजों में यह विकास की योजनाओं का हिस्सा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। गांव की पगडंडियों पर चलते हुये ऐसा महसूस होता है मानो समय यहां ठहर गया हो। यही वजह है कि अब ग्रामीण व्यंग्य में अपने गांव को “हापतबेड़ा नहीं, आफतबेड़ा” कहने लगे हैं। अनगड़ा प्रखंड और सिल्ली विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाला यह गांव वर्षों से मूलभूत सुविधाओं के लिये संघर्ष कर रहा है। पीने का पानी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, सड़क और रेलवे अंडरपास जैसी समस्यायें यहां के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। गांव के लोगों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने अपनी समस्याओं को सामने लाने के लिये मीडिया को न्योता दिया। जब कोहराम लाइव की टीम गांव पहुंची तो लोगों की आंखों में उम्मीद की एक नई किरण दिखाई दी। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे अपनी समस्याएं जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने रखते आ रहे हैं, लेकिन समाधान आज तक नहीं मिला।

आज भी डाड़ी का पानी पीने को मजबूर हैं लोग

21वीं सदी के दौर में जहां शहरों में शुद्ध पेयजल की योजनाओं पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं, वहीं हापतबेड़ा के लोग आज भी डाड़ी और प्राकृतिक जलस्रोतों के पानी पर निर्भर हैं। गांव की महिलाएं बताती हैं कि गर्मी के दिनों में पानी की समस्या और विकराल हो जाती है। स्वच्छ पेयजल की सुविधा नहीं होने से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी बढ़ जाती हैं। वहीं, शिक्षा के क्षेत्र में भी गांव की स्थिति चिंताजनक है। उच्च शिक्षा के लिये गांव के बच्चों को लगभग 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। कई परिवार आर्थिक तंगी और दूरी की वजह से बच्चों को आगे नहीं पढ़ा पाते। ग्रामीणों का कहना है कि यदि आसपास बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था होती तो गांव के कई बच्चे अपने सपनों को पंख दे सकते थे।

बीमारी आई तो बढ़ जाती है परेशानी

हापतबेड़ा के लोगों के लिये बीमारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि दूरी और संसाधनों की लड़ाई भी है। बेहतर स्वास्थ्य सुविधा के लिये ग्रामीणों को 5 से 10 किलोमीटर तक का सफर तय करना पड़ता है। आपातकालीन स्थिति में यह दूरी कई बार जानलेवा साबित हो सकती है। वहीं, रांची रेल मंडल का व्यस्त रेल मार्ग इसी गांव के बीचोंबीच गुजरता है। ग्रामीणों के अनुसार, रेलवे ट्रैक पार करना उनके लिये रोजमर्रा की मजबूरी है। कई बार हादसे हो चुके हैं। इंसानों के साथ-साथ मवेशी भी अक्सर ट्रेनों की चपेट में आ जाते हैं। ग्रामीण वर्षों से रेलवे ट्रैक के नीचे अंडरपास निर्माण की मांग कर रहे हैं, ताकि आवागमन सुरक्षित हो सके।

वोट बहिष्कार का ऐलान भी नहीं बदल सका हालात

ग्रामीणों का दर्द केवल सुविधाओं की कमी तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपनी समस्याओं के विरोध में वोट बहिष्कार का फैसला तक कर लिया था। हालांकि बाद में पुलिस और प्रशासन के समझाने पर लोगों ने मतदान किया। उस समय उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि उनकी समस्याओं पर ध्यान दिया जायेगा। लेकिन चुनाव बीत गया, सरकारें चलती रहीं और वादे भी हवा में उड़ते रहे। गांव की तस्वीर आज भी जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि चुनाव के दौरान नेता गांव की चौखट तक पहुंचते हैं, लेकिन उसके बाद कोई लौटकर हाल जानने नहीं आता। लोगों का कहना है कि न जनप्रतिनिधि उनकी सुध लेने आते हैं और न ही अधिकारी। यही वजह है कि गांव के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सुने क्या बोले गांववाले….

कोहरामलाइव के लिये रांची से सीनियर रिपोर्टर अखिलेश कुमार की रिपोर्ट 

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