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बाली उमर होते ही चली जाऊंगी परदेस, तुम देखते रहियो…

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रांची (कैमरामैन संजय कपरदार के साथ सत्य शरण मिश्र) : लड़कियां हैं, तो सपने भी होंगे। सपनों को पूरा करने के लिए संसाधनों की दरकार होगी, पर क्या करें। यहां न रोजगार है, न कारोबार। कुछ इसी हाल में अपने झारखण्ड की कुछ लड़कियों ने स्वेच्छा से पलायन का रास्ता चुना, हालांकि नाबालिग होने के कारण पुलिस उन्हें रेस्क्यू करके गुजरात से वापस ले आयी है। लेकिन वे कहती हैं, बालिग होते ही फिर चली जाऊंगी। आखिर वे बालिग होने का क्यों कर रही हैं इंतजार ? किसलिए जाना चाहती हैं वापस ?.. दखिये, समझिये और कमेंट बॉक्स में बताइये कि क्या इनका फैसला सही है?

झारखंड से ट्रैफिकिंग की गई हजारों लड़कियां वापस आने के लिए तरस रही हैं, लेकिन यह गरीब बच्ची उसी दलदल में लौटना चाहती है। जी हां, गरीबी और पेट की भूख ने इस मासूम के दिल को इतना कठोर बना दिया है कि यह हर झूठ, फरेब और धोखा सहने के लिए फिर से तैयार है।

अगस्त 2020 में सीमा गुजरात पहुंची। एक महीने तक काम किया। सैलरी भी मिली। अपनी मेहनत की पहली कमाई अपने हाथ में पाकर सीमा की खुशी का ठिकाना न रहा। लेकिन यह खुशी एक महीने भी नहीं टिकी। पुलिस उसे रेस्क्यू कर वापस झारखंड ले आयी। वह झारखंड तो आ गई, लेकिन न रोजगार से जोड़ने की पहल हुई न सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की।

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राजधानी रांची से करीब 45 किलोमीटर दूर इस गांव में जब कोहराम लाइव की टीम ट्रैफिकिंग की पूरी हकीकत जानने के लिए पहुंची। गांव में भिखारी बेदिया मिले। भिखारी ने बताया कि उसकी बेटी सुमित्रा बेदिया को भी रेस्क्यू कर पुलिस वापस लायी है। इसके अलावा उसी के पड़ोस में रहने वाले धरमू बेदिया, रामेश्वर बेदिया और कुढ़ू बेदिया की भी बेटियां वापस आई हैं। भिखारी ने कहा कि अब उसके परिवार के सामने फिर से रोजी-रोजी का संकट पैदा हो गया है। इसलिए उसकी बेटी सुमित्रा रोज मजदूरी करने रांची जाती है। सुमित्रा के अलावा रेस्क्यू कर लायी गयी अन्य चारों लड़कियां भी रांची जाकर रेजा या नौकरानी का काम करती हैं।

गांव की मंतरिया देवी की भी 17 साल की बेटी रीना कुमारी (बदला हुआ नाम) रेस्क्यू की गई है। उसकी मां ने बताया कि हम जैसे गरीब की बेटी को रोजगार मिला था, लेकिन उससे वह भी छिन गया है। अपने राज्य में रोजगार तो मिलता नहीं है। ऐसे में हमारी बेटियां नौकरी के लिए बाहर न जाएं तो क्या करें।

बीसा गोंदलीटोली में करीब 85 घर हैं। यहां सरकार की योजनाएं नहीं पहुंच पा रही हैं। इसके लिए भी स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आ रही हैं और लड़कियों को चिन्हित कर उन्हें रोजगार से जोड़ने की दिशा में कोशिश की जा रही है।

सरकारी फाइलों में तो ट्रैफिकिंग खत्म करने के लिए सरकार 34 योजनाएं चला रही है, लेकिन इनमें से एक भी योजना गोंदलीटोली जैसी बस्तियों में नहीं पहुंच रही। अगर योजनाएं पहुंचतीं तो खुद को ट्रैफिकिंग की आग में झोंकने के लिए सीमा जैसी लड़कियां अपने बालिग होने का इंतजार नहीं करतीं..

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