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देखिए, ओझा का ठप्पा लगते ही मिल जाता है नाम “डायन”

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मिटा दी जाती है हस्ती, खलनायक तक कभी नहीं पहुंच पाती है पुलिस

कोहराम लाइव डेस्‍क : ये है डायन। यह नाम इन्हें कोहराम लाइव ने नहीं दिया। मिला उनसे जिन्हें वे चाचा-मामा, भाई-देयाद पुकारती हैं। किसी ओझा गुनी से ठप्पा लगते ही मिल जाता है नाम-डायन। शनिचरी उरांव की जान खतरे में है। कभी भी मारी जा सकती हैं। ऐसी शंका खुद शनिचरी (बदला हुआ नाम) को है। आइये… देखें, सुने और समझे… क्या है माजरा…

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कभी रात में उनका दरवाजा पीटा जाता है, तो कभी उनके मासूम बेटे को अधमरा करके छोड़ दिया जाता है। घूम- घूम कर हर किसी से वह अपना गुनाह पूछती है। जवाब एक ही मिलता है-तुम डायन हो। याद है, तोहर चाची सास के गर्दनवा में जे दगवा हऊ, उ तोहर करल हऊ। जुल्म की इंतिहा तब एक दिन प्रबल हुई, जब उसके पूरे परिवार को मारने के लिए दौड़ाया गया। ऐसा नहीं है कि शनिचरी कोई पहली ऐसी औरत है जिसे यह नाम मिला। न जाने कितनों को मौत के घाट उतार दिया गया। अभी कुछ समय पहले ही बेड़ो में एक वृद्ध को काटा गया, खूंटी में एक ही परिवार के तीन जनों को मार कर जमींदोज कर दिया और गढ़वा के नारायणपुर गांव में पांच महिलाओं को निर्वस्त्र कर पूरे गांव में घुमाया गया। नंगा तो गांव हुआ, ये तो अब भी ढंकी-सहमी चीख रही हैं। कोई तो बचा लो। गिनाना मुश्किल है। शायद यही वजह है कि झारखण्ड पुलिस फाइल में ऐसी वारदातों डायन प्रथा के नाम से अलग खोल दिया गया है। आंकड़े तो भयावह हैं। एक ही सवाल है- यह शब्द डायन को कैसे और कब तक शासन या प्रशासन निगल पायेगा? जवाब किसी के पास नहीं है। बात तो पुलिस तक पहुंचती है, पर पुलिस क्या करती है, ये खुद सुनिए शनिचरी से।

शनिचरी उरांव की बेटी ने अपने भाई के साथ घटी घटना के बारे में बताया। उसने कहा कि उसका भाई खेत में बैठ कर आम खा रहा था। गांव-घर में किसी की शादी थी। गाना बज रहा था। तभी कुछ लोगों ने भाई को घेर लिया और बेतरह पीटने लगे। भाई लहूलुहान हो गया। जब उन्हें लगा कि वह मर गया है, तब वे वहां से चले गये। भाई को किसी तरह अस्पताल लेकर गये। किसी तरह उसकी जान बची।

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शनिचरी का बेटा बुरी तरह सहमा है। उस दिन की वारदात के बारे में वो कहता है कि मुझे ऐसा मारा कि हम बेहोसे हो गये। पीड़िता के पति का कहना है कि जिस दिन ये घटना घटी, गांव में पुलिस आयी थी, लेकिन यह कह कर चली गयी कि आपस में बातचीत कर सलट लो। झारखंड में जादू टोना और अंधविश्वास के मकड़जाल में जकड़े लोगों की गाथा कोई नयी बात नहीं है। कुछ संस्थाएं इस मसले पर काम भी कर रही हैं। उनका कहना है कि झारखंड के कुछ जिलों में होनेवाली ऐसी वारदातें संज्ञान में ही नहीं आतीं

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