Delhi : एक तरफ दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की आग में तप रही है, तो दूसरी तरफ अटलांटिक महासागर के एक हिस्से में कुछ ऐसा हो रहा है जिसने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। भारत से करीब 8000 किलोमीटर दूर समुद्र में उठ रही यह रहस्यमयी हलचल आने वाले वर्षों में भारतीय मानसून की तस्वीर बदल सकती है। वैज्ञानिकों की नई रिसर्च बताती है कि उत्तरी अटलांटिक महासागर में मौजूद एक असामान्य ठंडा क्षेत्र, जिसे “कोल्ड ब्लब” कहा जाता है, भारत के मौसम पर गहरा असर डाल सकता है। अगर यह बदलाव तेज हुआ तो देश के कई हिस्सों में बारिश का संतुलन बिगड़ सकता है। पिछले 25 वर्षों में भारतीय मानसून में बड़े बदलाव दर्ज किये गये हैं। जहां उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश का दायरा बढ़ा है, वहीं गंगा के उपजाऊ मैदानों में वर्षा लगातार घट रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ स्थानीय कारणों से नहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में हो रहे जलवायु परिवर्तनों से भी जुड़ा हुआ है।
1.5 अरब लोगों की जिंदगी पर असर
भारतीय उपमहाद्वीप की करीब डेढ़ अरब आबादी खेती, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था के लिये मानसून पर निर्भर है। अगर मानसून के पैटर्न में बड़ा बदलाव आता है तो इसका असर किसानों की फसलों, खाद्यान्न उत्पादन, जल भंडारण, बिजली उत्पादन और रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तरी अटलांटिक महासागर का एक बड़ा हिस्सा लगातार ठंडा हो रहा है, जबकि दुनिया के अधिकांश महासागर गर्म हो रहे हैं। ग्रीनलैंड के दक्षिण में स्थित यह क्षेत्र पिछले 120 वर्षों में आधे डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ठंडा हो चुका है। इसी असामान्य स्थिति को वैज्ञानिक “कोल्ड ब्लब” या “ग्लोबल वार्मिंग होल” कहते हैं। यह संकेत देता है कि अटलांटिक महासागर की धाराओं में बड़ा बदलाव हो रहा है, जिसका असर पूरी दुनिया के मौसम तंत्र पर पड़ सकता है।
शोध में सामने आये चौंकाने वाले संकेत
एजीयू एडवांस जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में वैज्ञानिकों ने जलवायु मॉडलों में इस कोल्ड ब्लब को शामिल कर नये विश्लेषण किये। नतीजों में पाया गया कि यह ठंडा क्षेत्र ऊपरी वायुमंडल की जेट स्ट्रीम को प्रभावित कर सकता है। इसके कारण नमी का प्रवाह बदल सकता है और अधिक बारिश उत्तर-पश्चिम भारत की ओर खिंच सकती है। दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में बारिश कराने वाली तूफानी प्रणालियां कमजोर पड़ सकती हैं। अध्ययन से संकेत मिले हैं कि भविष्य में उत्तर-पश्चिम भारत में भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं, जबकि गंगा के मैदानी इलाकों में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका है। यदि ऐसा हुआ तो कृषि, जल प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। शोधकर्ताओं ने इसे “बारोट्रोपिक गवर्नर मैकेनिज्म” से जोड़ा है। सरल शब्दों में समझें तो जब बड़े स्तर की हवाएं अपना स्वरूप बदलती हैं, तो वे छोटे स्तर पर बनने वाले मौसम तंत्रों को भी प्रभावित करती हैं। यही कारण हो सकता है कि दुनिया के कई हिस्सों में मौसम की चरम घटनाएं बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
जलवायु मॉडल की बड़ी कमी आई सामने
वैज्ञानिकों का कहना है कि अब तक इस्तेमाल किये जा रहे कई जलवायु मॉडल इस कोल्ड ब्लब के प्रभाव को ठीक से नहीं समझ पा रहे थे। नई रिसर्च बताती है कि पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में हो रही जलवायु प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इसलिए भविष्य के मौसम का सटीक अनुमान लगाने के लिए इन सभी कारकों को साथ जोड़कर देखना जरूरी है। भारत की खेती, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था मानसून की धड़कनों पर चलती है। ऐसे में समुद्र के हजारों किलोमीटर दूर हो रहे बदलाव भी यहां के मौसम को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में मानसून का स्वरूप और अधिक अनिश्चित हो सकता है। कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं सूखे जैसी परिस्थितियां देखने को मिल सकती हैं। ग्रीनलैंड के पास समुद्र का यह ठंडा इलाका फिलहाल वैज्ञानिकों की निगाहों में है। यह केवल महासागर की एक असामान्य घटना नहीं, बल्कि पृथ्वी के बदलते जलवायु संतुलन का संकेत माना जा रहा है। समुद्र की यह रहस्यमयी हलचल आने वाले समय में भारत के मानसून की दिशा और दशा दोनों बदल सकती है। इसलिए वैज्ञानिक लगातार इस पर नजर बनाये हुये हैं, क्योंकि इसका असर करोड़ों लोगों की जिंदगी और देश की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
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