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90 साल की उम्र में दी परीक्षा, लिखी हौसले की नई इबारत…

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Bihar : कहते हैं, सीखने की कोई उम्र नहीं होती। अगर मन में ज्ञान की प्यास हो तो उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है। बिहार के बेगूसराय में 90 साल के आचार्य सीताराम साहू ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उम्र के इस पड़ाव पर, जब अधिकांश लोग आराम और विश्राम को जीवन का हिस्सा बना लेते हैं, तब आचार्य साहू परीक्षा कक्ष में बैठकर नई पीढ़ी को सीखने का असली अर्थ समझा रहे हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) की परीक्षा में शामिल होने पहुंचे आचार्य सीताराम साहू को देखकर परीक्षा केंद्र पर मौजूद छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी हैरान रह गये। उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था और आंखों में ज्ञान हासिल करने की वही चमक, जो किसी युवा विद्यार्थी में दिखाई देती है।

परीक्षा केंद्र में चर्चा का विषय बने आचार्य साहू

बेगूसराय के जीडी कॉलेज स्थित परीक्षा केंद्र में रविवार को एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। यहां 90 साल के आचार्य सीताराम साहू संस्कृत विषय के ‘श्रीमद्भागवत गीता अध्याय’ की परीक्षा देने पहुंचे थे। परीक्षा कक्ष के बाहर उन्हें देखकर कई छात्र उत्सुक हो गये। कुछ ने उनसे बातचीत की तो कुछ उनके जज्बे को देखकर प्रेरित नजर आये। देखते ही देखते पूरे केंद्र में उनकी चर्चा होने लगी। आचार्य सीताराम साहू का मानना है कि शिक्षा जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। उनका कहना है कि इंसान को अंतिम सांस तक सीखते रहना चाहिये। उन्होंने कहा कि ज्ञान अर्जित करने की कोई सीमा नहीं होती। नई बातें सीखना और खुद को बेहतर बनाना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यही सोच उन्हें इस उम्र में भी पढ़ाई करने और परीक्षा देने के लिए प्रेरित करती है।

युवाओं के लिये मिसाल बने आचार्य

आज के दौर में कई युवा छोटी-छोटी परेशानियों या असफलताओं से निराश होकर पढ़ाई से दूरी बना लेते हैं। ऐसे समय में आचार्य सीताराम साहू की कहानी एक बड़ी सीख देती है। 90 वर्ष की उम्र में परीक्षा देने पहुंचे इस बुजुर्ग विद्यार्थी ने साबित कर दिया कि यदि मन में सीखने की ललक हो तो उम्र, परिस्थितियां और चुनौतियां कभी रास्ता नहीं रोक सकतीं। आचार्य साहू के जज्बे को देखकर परीक्षा केंद्र पर मौजूद छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने उनकी जमकर सराहना की। लोगों का कहना था कि शिक्षा के प्रति ऐसा समर्पण आज के समाज में दुर्लभ है।कई विद्यार्थियों ने उन्हें प्रेरणा स्रोत बताते हुये कहा कि जब 90 साल की उम्र में कोई व्यक्ति पढ़ाई के लिये इतना समर्पित हो सकता है, तो युवाओं को भी अपने लक्ष्य के प्रति गंभीर होना चाहिये।

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