Bihar : भीषण गर्मी और उमस से बेहाल लोगों के लिये राहत भरी खबर है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार मृगशिरा नक्षत्र की समाप्ति के बाद सोमवार, 22 जून की रात 8 बजकर 27 मिनट पर सूर्य आद्रा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे। इसके साथ ही प्रकृति के एक नये अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है। ग्रामीण भारत में इसे बारिश, हरियाली और खेती-किसानी की उम्मीदों का नक्षत्र कहा जाता है। आद्रा नक्षत्र का प्रभाव 6 जुलाई की रात 10 बजकर 2 मिनट तक रहेगा। इसके बाद पुनर्वसु नक्षत्र का आरंभ होगा।
किसानों के लिये शुभ संकेत, मानसून से जुड़ी उम्मीदें
भारतीय कृषि परंपरा में आद्रा नक्षत्र का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इसके आगमन के साथ मानसून सक्रिय होता है और धरती को झुलसा देने वाली गर्मी से राहत मिलने लगती है। गांवों में किसान इस अवधि को खरीफ फसलों की तैयारी और खेतों में नई उम्मीदें बोने का समय मानते हैं। धान, मक्का और विभिन्न सब्जियों की खेती के लिए भी यह समय महत्वपूर्ण माना जाता है। बिहार के भोजपुर और आसपास के इलाकों में आद्रा नक्षत्र का स्वागत एक खास परंपरा के साथ किया जाता है। यहां घर-घर दलही पुड़ी, खीर, आम और विभिन्न मिष्ठान्न बनाये जाते हैं। इन व्यंजनों का पहले भगवान को भोग लगाया जाता है, फिर परिवार, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ मिलकर उत्सव की तरह इसका आनंद लिया जाता है। वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी ग्रामीण संस्कृति की खूबसूरत पहचान बनी हुई है।
बीजारोपण के लिये माना जाता है सबसे शुभ समय
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार आद्रा नक्षत्र खेती की शुरुआत और बीजारोपण के लिये सर्वश्रेष्ठ काल माना जाता है। खरीफ फसलों की बुवाई का बड़ा हिस्सा इसी अवधि में किया जाता है। हालांकि परंपरागत मान्यताओं के मुताबिक आद्रा नक्षत्र के शुरुआती तीन दिनों में खेती-किसानी के कुछ कार्यों से परहेज करने की सलाह दी जाती है। इसके बाद कृषि कार्यों की रफ्तार तेज हो जाती है।
भगवान रुद्र से जुड़ा है आद्रा नक्षत्र
वैदिक ज्योतिष के अनुसार आद्रा 27 नक्षत्रों में छठा नक्षत्र है। इसके अधिष्ठाता देव रुद्र हैं, जिन्हें भगवान शिव का उग्र स्वरूप माना जाता है। वहीं इसका स्वामी ग्रह राहु है। रुद्र का संबंध तेज हवाओं, बादलों और वर्षा से माना जाता है। यही वजह है कि आद्रा नक्षत्र को प्रकृति में बदलाव, नवजीवन और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
‘आद्रा’ का मतलब ही है नमी और गीलापन
संस्कृत भाषा में ‘आद्रा’ शब्द का अर्थ है गीलापन या नमी। यही कारण है कि इस नक्षत्र को वर्षा का दूत भी कहा जाता है। मान्यता है कि आद्रा काल में होने वाली बारिश धरती को तृप्त करती है, जलस्तर बढ़ाती है और किसानों के खेतों में नई उम्मीदों के बीज बोती है। पंडितों और ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इस वर्ष भीषण गर्मी के बाद बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अच्छी वर्षा होने के संकेत मिल रहे हैं। हालांकि आद्रा नक्षत्र के शुरुआती कुछ दिनों में बारिश की गतिविधियां अपेक्षाकृत कमजोर रह सकती हैं। इसके बाद मानसून के और सक्रिय होने की संभावना जताई जा रही है।
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