Ranchi : सिलक्यारा सुरंग में करीब 399 घंटे तक कैद मजदूरों को सही-सलामत बाहर निकालने में बमुश्किल 59 मिनट का समय लगा। 17 रोज तक लगातार दुश्वारियों और उम्मीद के साथ-साथ रेस्क्यू ऑपरेशन चलता रहा। पूरे ऑपरेशन में यह साबित हुआ कि हौंसला जरूरी है, क्योंकि पत्थरों के सीने चीरकर ही रास्ते निकलते हैं। 41 मजदूरों ने अपना हौंसला बनाये रखा, वहीं उन्हें बाहर निकालने वालों का इकबाल बुलंद रहा। कई बार हताशा और निराशा ने आकर इन्हें घेरा, पर बाहर से अंदर और अंदर से बाहर के लोगों ने धैर्य का छोटा सा सुराख रोशन रखे रहा। दिवाली के रोज देश में सारे जहां के घर रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगा रहे थे, वहीं अचानक 41 परिवारों के आगे अंधेरा छा गया।
सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए जिस ऑगर मशीन से शुरुआत की गई, आखिर में उसी राह से उन्हें बाहर निकाला गया। पूरे ऑपरेशन में ऑगर कई बार रुकी-टूटी-फूटी, सुरंग में कंपन हुआ, लेकिन विशेषज्ञ डटे रहे और धैर्य बनाये रखा। 17 रोज की कड़ी मशक्कत ने 41 परिवारों में उजियारा ला दिया। एक समय जब ऑगर ने पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया तो उनके हाथों ने उसी पाइप में दिन रात मैनुअल ड्रिलिंग कर पूरी दुनिया में खूब वाहवाही बटोरी। इस दरम्यान कुछ ऐसे भी मौके आये जब लगने लगा कि सारा कुछ कहीं बेकार ना हो जाये। ऐसे वक्त में देवभूमि के प्रति आस्था ने आस जगाने का काम किया। भगवान बौखनाग देवता का मंदिर स्थापित करने से लेकर सुरंग के द्वार पर बनी देवता की आकृति भी ऑपरेशन में जुटे लोगों के लिये आस्था की वजह बनी। बेहतरीन कामयाबी मिलते ही सबके सब आस्था के सागर में सिर झुकाये। इसमें आस्ट्रेलियन विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स भी नतमस्तक नजर आये। बचाव अभियान में शामिल अधिकारी, विशेषज्ञ, विज्ञानी, तकनीशियन और मजदूर निराशा के समय इसी आस्था से आस जगाते नजर आये।
सुरंग में फंसे मजदूरों ने अपने जीवन के 9 दिनों तक केवल ड्राई फ्रूट्स और चने खाकर रहे। सुरंग के भीतर बह रहे पानी से अपनी प्यास बुझाई। जिंदादिल मजदूरों ने कई रातें बिना सोये गुजार दी। ऑपरेशन सिलक्यारा सभी मजदूरों की जिंदादिली की एक नजीर बन गई। 12 नवम्बर को भोर में साढ़े पांच बजे जब सुरंग हादसा हुआ तब मजदूरों की आवाज सुनने को केवल चार इंच की एक पाइप ही सहारा बची। पहले सबसे बात हुई तो पता चला कि सभी सही सलामत हैं, लेकिन बुरी तरह फंस गये हैं। उन्हें भूख सताने लगी। खाना भेजने का कोई उपाय नहीं था। 20 नवंबर तक उन्हें केवल जरूरी दवाएं, चने और ड्राई फ्रूट ही चार इंच के पाइप से प्रेशर के माध्यम से भेजे जाते रहे। सभी मजदूरों ने इसी से अपनी भूख मिटाई। कई मजदूरों को पेट में दर्द शुरू हो गया। 20 नवंबर को जैसे ही छह इंच के पाइप को भीतर तक पहुंचाने में कामयाबी मिली तो मजदूरों को खिचड़ी, दाल-चावल, रोटी, केले, संतरे भेजे गये। वहीं, मुंह धोने के लिये ब्रश, टूथपेस्ट, दवाएं, जरूरी कपड़े भेजे गये। डॉक्टर, मनोचिकित्सक उनका हौसला बढ़ाते रहे। किसी ने हौसला नहीं खोया। नतीजा, रिजल्ट सामने है।
CM धामी ने दिये एक-एक लाख के चेक
इस बीच, उत्तराखंड के CM पुष्कर सिंह धामी ने सुरंग से बाहर निकले 41 मजदूरों को सहायता राशि के चेक सौंपे। उन्हें एक-एक लाख रुपये दिये गये। वहीं उनकी बहादुरी पर उन्हें शाबाशी दी। पीठ थपथपाई। लंबे समय तक हौंसला बनाये रखने पर उनकी सराहना की। वहीं, रेस्क्यू ऑपरेशन को सफल बनाने वाले रैट माइनिंग दल के सदस्यों को भी 50-50 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देने का ऐलान किया। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र चिन्यालीसौड़ में भर्ती मजदूरों को चेक दिया गया। उन्होंने कहा कि हादसे के चलते कोई भी दिवाली नहीं मना पाया था, अब वह दिवाली का जश्न मनाएंगे।
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