Kohramlive : वो 22 अप्रैल की दोपहर थी, कश्मीर की वादियां जैसे स्वर्ग का पैगाम दे रही थीं। पहलगाम की गोद में बसा बैसरन, जहां फूलों की खुशबू और देवदार के पेड़ों की सरसराहट इंसान को खुदा के करीब ले जाती थी, वहां अचानक वहशत ने दस्तक दी। चार हथियारबंद साये, नफ़रत की आंखों और बारूद की सांसों के साथ, उस जन्नत में उतर आये। वो किसी धर्म के नहीं थे वो इंसानियत के कातिल थे। कौस्तुभ गणबोटे, पुणे का एक आम इंसान, जिसे जिंदगी में बस दो चीजें प्यारी थीं—अपना परिवार और अपने देश की मिट्टी। उसके साथ उसकी पत्नी संगीता और दोस्त संतोष जगदाले थे। परिवारों ने सोचा था, ‘कश्मीर की ठंडी हवा में कुछ गर्म यादें समेट लेंगे…’ किसे पता था कि ये उनकी आखिरी यात्रा होगी।
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