Kohramlive : हिंदू पंचांग के अनुसार बीते 19 मार्च से हिंदू नववर्ष यानी विक्रम संवत 2083 का शुभारंभ हो गया है। इस बार नया संवत्सर Raudra Samvatsar 2083 के नाम से जाना जायेगा, जिसे ज्योतिष शास्त्र में विशेष प्रभाव वाला माना जाता है। यह संवत्सर 7 अप्रैल 2027 तक रहेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष Jupiter को वर्ष का राजा माना गया है। मान्यता है कि जिस दिन संवत्सर की शुरुआत होती है, उसी दिन का ग्रह पूरे वर्ष का राजा बनता है। गुरु के राजा बनने को बड़े बदलाव, नई चुनौतियों और अवसरों का संकेत माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि ऐसा ही रौद्र संवत्सर 1966 में भी बना था। उस समय दुनिया में बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव देखने को मिले थे। इसी वर्ष भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शाश्त्री का आकस्मिक निधन हुआ था और इसके बाद इंदिरा गांधी के रूप में देश को नया नेतृत्व मिला था। वैश्विक स्तर पर भी उस समय Cold War का दौर था, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में तनाव और राजनीतिक खींचतान बढ़ी हुई थी। ज्योतिषीय आकलन के मुताबिक रौद्र संवत्सर में कई देशों में राजनीतिक हलचल बढ़ सकती है। कुछ जगह सत्ता परिवर्तन, बड़े नेताओं के निधन या नई राजनीतिक शक्तियों के उभरने जैसे संकेत भी माने जा रहे हैं। भारत के लिये भी पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा और कूटनीतिक सतर्कता जरूरी मानी जा रही है। यह संवत्सर तकनीक के क्षेत्र में भी बड़े बदलाव का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में Artificial Intelligence का विस्तार तेजी से होगा और यह कई क्षेत्रों में इंसानों का सहयोगी बनेगा। इसके साथ ही अंतरिक्ष क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। India, United States, China, Russia और Japan जैसे देश नये अंतरिक्ष मिशनों के जरिये अपनी तकनीकी ताकत दिखाने की कोशिश करेंगे। इतिहास बताता है कि 1966 के रौद्र संवत्सर के दौरान एशिया के कई हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ की घटनायें हुई थीं। भारत और आसपास के क्षेत्रों में इसका असर कृषि और जनजीवन पर भी पड़ा था। ज्योतिषीय दृष्टि से रौद्र संवत्सर को ऐसा समय माना जाता है, जिसमें चुनौतियों के साथ बड़े अवसर भी छिपे होते हैं। तकनीक, शिक्षा और कानून व्यवस्था के क्षेत्रों में भी बदलाव की संभावनाएं जताई जा रही हैं।
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