कोहराम लाइव डेस्क : “सूअर वध”, जानें गोवर्धन पूजा में क्यों होती है यें परंपरा। जी हां ये अनूठी परंपरा कानपुर की हैं। जिसमें सूअर के मौत आने तक पैर से रौंदते हैं गाय।
गोवर्धन पूजा में आयोजन किया जाता है “सूअर वध”
आइए, आपको कानपुर के घाटमपुर की एक अनूठी परंपरा से रू-ब-रू कराते हैं, जिसमें दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा और भैया दूज पर गाय के पैरों तले सूअर को रौंदा जाता है। यह सिलसिला तबतक जारी रहता है, जबतक सूअर की मौत नहीं हो जाती है। इस खेल के प्रारंभ से अंत तक युवा और बच्चों का शोर रहता है और फिर वो ग्वाल बाले बनकर दिवारी नृत्य करके खुशियां मनाते हैं।
आसुरी शक्ति का प्रतीक मान सूअर का करते हैं वध
घाटमपुर के गांवों में गोवर्धन पूजा के दिन आसुरी शक्ति के प्रतीक सूअर को सजी-धजी गाय पैरों तले रौंदती है। आयोजन के दौरान ग्वालों का रूप धरे युवा ढोल की थाप पर उछल-उछल कर दिवारी नृत्य करते हैं। गांवों में यह परंपरा सदियों से प्रचलित है। दो दशक पहले तक करीब-करीब हर गांव में रहुनिया (गोचर की भूमि) के नाम से विख्यात मैदान पर लगने वाले मेले में “सूअर वध” का आयोजन होता था। क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक गांवों में बीते कई दशकों से इस परंपरा का निर्वहन हो रहा है, हालांकि पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव तले कई गांवों में यह परंपरा अब खात्मे की ओर है।
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यह है परंपरा की मान्यता
“सूअर वध” मनाने की मान्यता यह हैं कि इंद्र के मूसलाधार बारिश से लोगों को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाया था। जिसके नीचे श्रीकृष्ण के सभी ग्वाल बाल व गाय मौजूद थीं। इसी दौरान कंस द्वारा भेजा गया राक्षस सूअर का रूप धरकर उनके बीच आ घुसा था और ग्वालबालों को मारने लगा था।
श्रीकृष्ण ने आदेश देकर गायों से उसका वध कराया था। इसी को लेकर बछड़े को जन्म देने वाली गाय और नर सूअर के बीच लड़ाई की यह प्राचीन परंपरा अभी तक जीवंत है। सूअर के मरने के बाद ही यह आयोजन खत्म होता है। पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता की बयार के बीच ऐसे आयोजन जीवंत भारतीय संस्कृति के उजले पक्ष का परिचायक है।
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