# Simon Oraon
अजीब दस्तूर है जमाने का… जो सुख देते हैं, वही सबसे ज्यादा दुख भी
जलाकर बैठे हैं उम्मीद का दीया… इंतजार है किसी के आने का….
रांची, सत्य शरण मिश्र : “क्या करेंगे इस पद्मश्री सम्मान और पुरस्कार का? इससे बड़ी चीज हमारे लिए दो वक्त की रोटी है।” यह कहते-कहते रुंध गया झारखंड के “जलपुरुष” पद्मश्री Simon Oraon का गला। सिमोन बाबा कहते हैं “क्या बताएं दुखड़ा। बहू और बेटी दूसरों के घरों में जूठे बर्तन धोकर भर रही हैं अपना पेट। पोती दिल्ली में घरेलू दाई का काम करती है। सिर्फ 7 हजार रुपये महीना मिलता है। हम सबको कहते हैं-कमाना है तो मिट्टी से लड़ो और बर्बाद होना है तो आदमी से लड़ो। हमको आसपास और दूर-दूर के लोग जानते हैं, मानते हैं, लेकिन सरकार का कोई अधिकारी हालचाल लेने नहीं आया।“ पैबंद लगा पायजामा और एक टूटी चप्पल पहने देश का जलपुरुष निराश है, दुखी है और किसी को कोई फिकर तक नहीं। सचमुच सिमोन उरांव की ऐसी दास्तां है कि सुनकर किसी का भी दिल दरकने लगे।
Simon Oraon की पोती दिल्ली में करती है दाई का काम, मिलते हैं महीना 7 हजार
Simon Oraon की बहू और पोती समेत परिवार के सभी सदस्य किसी तरह अपना पेट पाल रहे हैं। सिमोन के मंझले बेटे सुधीर उरांव को कुरेदने पर उनके अंदर से गुस्सा फूट पड़ता है। वे कहते हैं-इतना बड़ा सम्मान मिला, हमलोगों को लगा कि अब हमारे अच्छे दिन आयेंगे। लेकिन पहले जो हालत थी, उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। हमारे लिए तो सब दिन एक बराबर ही है। पहले लगता था कि कुछ अच्छा होगा, लेकिन आज भी हम वही कर रहे हैं- मेहनत-मजूरी। कुछ भी नहीं बदला हमारे जीवन में। सुधीर की छोटे भाई की विधवा सेवी उराइन पास ही बैठी बस ताकती रहती हैं।
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देश-विदेश में मिलता है सम्मान, यहां हैं “फकीर” राजा
Simon Oraon 70 साल से 12 पड़हा राजा भी हैं। जल संरक्षण के लिए सिमोन उरांव को 2016 में पद्मश्री सम्मान मिला था। सिमोन दादा भर्राई आवाज में कहते हैं, “पद्मश्री देकर सरकार ने हमारा लोड बहुत बढ़ा दिया है। पूरे देश में लोग बुलाते रहते हैं। इससे बहुत दिक्कत होती है। पद्मश्री से पेट नहीं भर सकता। सम्मान से बढ़कर है पेट का सवाल।
सिमोन दादा ने 1955-70 के बीच आदिवासी इलाकों में बांध बनाने का अभियान चलाया। अभी इससे चार सौ एकड़ में जमीन की सिंचाई की जाती है। उनके इस काम के लिए देश-विदेश में उन्हें जाना गया। सिमोन के मंझले बेटे सुधीर उरांव बताते हैं कि पिता के बनाए बांधों और तालाबों से फसलों की सिंचाई हो जाती है, लेकिन मछली पालन का काम नहीं हो पा रहा है, क्योंकि बांधों और तालाबों का गहरीकरण करने की दिशा में प्रशासन की ओर से कोई पहल नहीं की गई।
आयुर्वेदिक दवाएं बेचकर गुजारनी पड़ रही जिंदगी
87 साल के सिमोन उरांव में आज भी पहले जैसा जोश देखने को मिलता है, लेकिन गरीबी में दिन काट रहे सिमोन को उम्र के इस पड़ाव पर वृद्धा पेंशन भी नहीं मिलती है। आयुर्वेदिक दवाएं बनाकर बेचते हैं, जिससे उन्हें कुछ पैसा मिल जाता है। पत्नी विरजिनिया उरांइन को वृद्धा पेंशन मिलती है। वे कहते हैं “हम पद्मश्री मांगने नहीं गए थे, वैसे ही पेंशन भी मांगने नहीं जाएंगे।
जिस शख्स ने अपने बूते इतने बड़े पैमाने पर पर्यावरण संरक्षण की युक्ति निकाली, जो करोड़ों लोगों के लिए नायक बनकर उभरा, देश-विदेश में जिसकी सादगी और अच्छाइयों की चर्चा होती है, वही शख्स झारखंड जैसे राज्य में गरीबी और बेबसी का जीवन जीने को मजबूर है। राज्य का मान बढ़ाने वाला 87 साल का बुजुर्ग और उसका परिवार अगर दुख के आंसू रोने को मजबूर है, तो कहीं न कहीं हमारा सिस्टम कसूरवार है।
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