Ranchi : कभी झारखंड के घने जंगलों में नक्सलियों की बंदूकें कानून-व्यवस्था के लिये सबसे बड़ी चुनौती थीं। पुलिस पर हमले होते थे, हथियार लूटे जाते थे और उन्हीं हथियारों के दम पर लाल आतंक अपना असर दिखाता था। SP तक मारे गये, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। झारखंड पुलिस का दावा है कि लगातार चलाये गये अभियानों और हथियारों की बरामदगी ने नक्सल संगठनों की कमर तोड़ दी है और राज्य में नक्सलवाद अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है। नक्सलियों के खिलाफ सबसे प्रभावी रणनीति उनके हथियारों के नेटवर्क पर चोट करना रही। सुरक्षा बलों ने न केवल वर्षों पहले लूटे गये सरकारी हथियार वापस हासिल किये, बल्कि बड़ी संख्या में नक्सलियों के अन्य हथियार, विस्फोटक और लेवी की रकम भी बरामद की।
साढ़े छह साल में 972 हथियार बरामद
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021 से 30 जुलाई 2026 तक चलाये गये नक्सल विरोधी अभियानों में सुरक्षा बलों ने 972 हथियार बरामद किये। इनमें 299 पुलिस के हथियार
85 रेगुलर (फैक्ट्री निर्मित) हथियार, 588 देसी हथियार शामिल हैं। यानी बरामद हथियारों में करीब 30 प्रतिशत वे सरकारी हथियार हैं, जो पहले नक्सलियों के कब्जे में चले गये थे। इसी अवधि में सुरक्षा बलों ने 61,847 गोलियां, 2,163 IED निष्क्रिय किये, 1,903 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री और करीब 2.01 करोड़ रुपये की बातौर लेवी वसूली गई रकम भी बरामद की है। पुलिस का मानना है कि इन कार्रवाइयों से नक्सलियों की संचालन क्षमता पर बड़ा असर पड़ा है।
2001 से 2020 तक भी चला था बड़ा अभियान
झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2001 से दिसंबर 2020 के बीच भी सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के ठिकानों पर कार्रवाई करते हुये नक्सलियों के कई बंकर ध्वस्त कर दिये। राज्य के पहले DGP टीपी सिन्हा अपनी कार्यशैली को लेकर अपनी एक अलग पहचान बनाई। IG स्तर तक के अधिकारियों को सांरडा तक में कैंप करना पड़ा। एक महिला IG तक से यह कहा गया था कि यहां मुख्यालय में कुर्सी तोड़ने से अच्छा है सांरडा में जाकर नक्सलियों की कमर तोड़ दो। इस महिला के IG के पति तक सीनियर IPS अधिकारी थे। बाद में ये दोनों IPS दंपत्ति अधिकारी केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले गये। इस अवधि में 277 पुलिस के हथियार, 77 रेगुलर हथियार, 1,778 देसी हथियार बरामद किये थे। इस अवधि में कुल 1,855 हथियार, 68,846 राउंड गोलियां, 3,661 आईईडी, 21,867.56 किलोग्राम विस्फोटक, 74,807 डेटोनेटर और करीब 6.40 करोड़ रुपये की लेवी जब्त की गई थी। दोनों अवधियों को मिलाकर सुरक्षा बलों ने करीब 2,827 हथियार बरामद किये हैं। IG ऑपरेशन के पद पर आये तेज तर्रार IPS अधिकारी आशीष बत्रा एवं अमोल वेणुकांत होमकर की भूमिका भी सराहनीय रही। एक से बढ़कर एक छोटे-बड़े नक्सली और अपराधी पुलिस के सामने नतमस्तक हो गये। CRPF के IG साकेत कुमार सिंह के योगदान को भी कभी भुलाया नहीं जा सकता। रांची के तत्कालीन पुलिस कप्तान कुलदीप द्विवेदी के कार्यकाल में कुख्यात कुंदन पाहन पुलिस के सामने नतमस्तक हो गया। कुंदन पाहन को हथियार डालने में ASI प्रवीण तिवारी की सराहनीय भूमिका रही। DGP के पद पर आये धीर-गंभीर नीरज सिन्हा ने कोई लंबी-चौड़ी बातें मीडिया के सामने कभी नहीं की, परन्तु उनकी कार्यशैली और दक्षता का नतीजा यह रहा कि पुलिस ने सांरडा पहाड़ पर तिरंगा फहरा दिया। प्रभारी DGP के पद पर आये एमवी राव ने कई कथित सफेदपोश और छोटे-बड़े अपराधियों के उठते फन को कुचल दिया। इसके बाद DGP की कुर्सी पर कई IPS अधिकारी आये और गये। फिलहाल, DGP की पद पर आई सीनियर IPS अधिकारी तदाशा मिश्र अपराधियों एवं उग्रवादियों के इल्म की जानकार मानी जाती हैं। धीर-गंभीर और मीडिया से दूर रहनेवाली DGP तदाशा मिश्र रांची में सिटी SP एवं रूरल SP पद पर भी लंबे अर्से तक काम कर चुकी हैं। 2 करोड़ के ईनामी मिसिर बेसरा और उसके खासमखास की गिरफ्तारी DGP तदाशा मिस्र एवं CRPF के IG साकेत कुमार सिंह एवं झारखंड जगुआर के IG अनुप बिरथरे की रणनीति का नतीजा है।
हथियार छिनते ही कमजोर पड़े नक्सली
झारखंड पुलिस के IG स्तर के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त्त पर बताया कि राज्य में नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों की सबसे बड़ी ताकत उनके हथियार थे। लगातार अभियानों, आत्मसमर्पण, गिरफ्तारियों और मुठभेड़ों के बाद बड़ी संख्या में हथियार बरामद होने से उनकी ताकत काफी कमजोर हुई है। नक्सलियों के कब्जे से बरामद होने वाले हथियारों की पहचान के लिये झारखंड पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने आधुनिक डिजिटल डेटाबेस विकसित किया है। किसी भी AK-47, INSAS, SLR या अन्य हथियार का सीरियल नंबर सिस्टम में मिलाते ही यह पता चल जाता है कि वह किस राज्य, किस पुलिस इकाई या किस केंद्रीय बल का है। इसके बाद नियमानुसार संबंधित एजेंसी को हथियार वापस सौंपने की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
देशभर में साझा होता है हथियारों का डेटा
पुलिस के अनुसार, NIA के “Lost, Looted and Recovered Firearm” डेटाबेस में देशभर के राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय सुरक्षा बलों के गुम, लूटे गये और बरामद हथियारों का रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है। इससे झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा समेत अन्य राज्यों की सुरक्षा एजेंसियां रियल-टाइम में सूचनाएं साझा कर पाती हैं और हथियारों की ट्रैकिंग पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो गई है। झारखंड पुलिस का कहना है कि नक्सलियों के हथियारों पर लगातार की गई कार्रवाई ने उनके नेटवर्क को कमजोर किया है। हालांकि सुरक्षा अभियान अब भी जारी हैं और शेष सक्रिय उग्रवादियों के खिलाफ अभियान लगातार चलाये जा रहे हैं।
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