CHATRA (Anuj Chandravanshi): नल है तो पानी नहीं, पोल है तो बिजली नहीं, ढिबरी है तो मिट्टी तेल नहीं। स्कूल-कॉलेज का कोई नामो निशान नहीं। हॉस्पिटल तो सपना बन गया। गांव में आने जाने के लिये पांच नदियों को पार कर जाना पड़ता है। एक ही नदी पांच बार घूमा है। कोई रोड नहीं है। पीने का पानी लाने के लिये कोसों दूर जाना पड़ता है। उबड़-खाबड़ रास्तों पर कभी धूल उड़ाती गाड़ियां भी जल्दी नहीं दिखती। जब कभी गांव में किसी बहू बेटी को प्रसव पीड़ा सताती तो एम्बुलेंस रास्ते में ही फंस जाती है। फंसे एम्बुलेंस को निकालने को लिये गांव के लोगों को जुटाना पड़ता है। खुस्की रास्ता है। चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़ है। यह दुख भरी कहानी है चतरा के एक छोटे से कुब्बा गांव की है।
आजादी के 75 साल के जश्न के अमृत महोत्सव के बारे में इस गांव के लोगों को कुछ भी पता नहीं। नसीब उनका खोटा का खोटा ही रह गया। विकास की लौ से कोसों दूर कुब्बा गांव में आज एक महिला को प्रसव पीड़ा हुई। उसकी हालत खराब थी। सोर्स पैरवी भिड़ाने पर गांव में एक एम्बुलेंस आई, पर रास्ते में ही फंस गयी। गांव वाले को फिर से जुटाया गया, तब जाकर कहीं फंसे एम्बुलेंस को बाहर निकाला गया। गांव के कुछ लोगों ने बताया कि कुब्बा गांव चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड के योगियारा पंचायत के अधीन आता है। इस गांव में करीब 50 घर है। आबादी लगभग 489 के आसपास होगी। गांव के बूढ़े बुजुर्ग का कहना है कि उन्हें पेंशन तक नहीं मिलती। भगवान से मनाया जाता है कि रात में किसी को सांप-बिच्छु ना डंसे। ना ही किसी को पेट में दर्द हो। इमरजेंसी होने पर भी गांव से निकलना मुश्किल हो जाता है। कई लोग अबतक तड़प तड़प मर चुके हैं। गांव के लोगों का नसीब खोटा का खोटा रह गया। गांव की इस दशा के बारे में चतरा के डीसी अबु इमरान का कहना है कि बहुत जल्द सभी योजनाओं से कुब्बा गांव को जोड़ा जायेगा।
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