UP : बीमारी से राहत देने वाली दवायें अब कई जगह जिंदगी बचाने के बजाय खतरा बनती जा रही हैं। इसकी वजह है नकली दवाओं का वह खतरनाक नेटवर्क, जिसने अब अपराध की दुनिया में तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को भी शामिल कर लिया है। लखनऊ में औषधि विभाग की जांच के दौरान जो खुलासे हुये हैं, उन्होंने अधिकारियों तक को हैरान कर दिया है। जांच में सामने आया है कि नकली दवा माफिया अब AI की मदद से नामी कंपनियों जैसी हूबहू पैकेजिंग, क्यूआर कोड और दवाओं का रंग-रूप तक तैयार कर रहे हैं।
AI से तैयार हो रही ‘असली जैसी’ नकली दवायें
औषधि विभाग के अधिकारियों के हवाले से मीडिया में आई खबर के मुताबिक आरोपी पहले नामी कंपनियों की दवायें खरीदते थे। फिर दवा के पैकेट पर लिखी हर जानकारी, डिजाइन, क्यूआर कोड, रंग, आकार और प्रिंटिंग पैटर्न को AI तकनीक की मदद से कॉपी कर नया पैकेट तैयार किया जाता था। यहीं नहीं, माफिया असली दवा को निजी लैब में जांच के लिये भेजते थे, ताकि उसके कंपोनेंट की जानकारी मिल सके। फिर उन्हीं कंपोनेंट्स को मिलाकर नकली दवा तैयार की जाती थी और उसकी भी लैब जांच कराई जाती थी। यानी नकली दवा इतनी “वैज्ञानिक तरीके” से बनाई जा रही थी कि सामान्य जांच में उसे पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता था।
करोड़ों की दवायें जब्त
लखनऊ मुख्यालय से आई 30 औषधि निरीक्षकों की टीम ने लगातार तीन दिन तक छापेमारी अभियान चलाया। इस दौरान 18 फर्म और दो गोदामों से करीब दो करोड़ रुपये की नकली, एक्सपायर्ड, सैंपल और सरकारी अस्पतालों की दवायें बरामद की गईं। सहायक आयुक्त औषधि Brijesh Yadav ने मीडिया को बताया कि पूछताछ और छापों में कई महत्वपूर्ण साक्ष्य मिले हैं और रैकेट से जुड़े अन्य लोगों की तलाश जारी है।
जब कंपनी की बिक्री घटती, तब खुलता खेल
जांच में यह भी सामने आया कि नकली दवा माफिया बाजार में असली कंपनियों से कम कीमत पर दवायें बेचते थे। दुकानदार ज्यादा मुनाफे के लालच में इन्हीं दवाओं को खरीद लेते थे। जब किसी कंपनी की बिक्री अचानक प्रभावित होने लगती, तब कंपनियां विभाग से शिकायत करती थीं। इसके बाद रेकी और छापेमारी कर ऐसे रैकेट पकड़े जाते थे।
71 करोड़ की दवाओं वाला मामला फिर चर्चा में
बीते साल अगस्त में भी STF और औषधि विभाग ने पांच गोदामों पर छापा मारकर करीब 71 करोड़ रुपये की दवायें जब्त की थीं। इनमें एंटीबायोटिक, एलर्जी और पेट रोग से जुड़ी कई दवायें शामिल थीं। हैरानी की बात यह रही कि जांच के लिये भेजे गये 28 नमूनों में 27 पास हो गये थे। सिर्फ एक दवा अधोमानक पाई गई थी। यानी नकली दवाओं का यह नेटवर्क अब इतना “हाईटेक” हो चुका है कि सामान्य जांच में पकड़ना आसान नहीं रह गया है।
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