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Latehar : रहने को घर नहीं, खाने को भोजन नहीं, अपना खुदा है रखवाला

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Latehar सदर प्रखंड की परसही पंचायत के डुमरिया गांव में है ऐसा परिवार

लातेहार : Latehar : रहने को न घर, खाने को भोजन नहीं, अपना खुदा है रखवाला : हम बार-बार नेताओं और अनेक बुद्धिजीवियों के मुख से सुनते आए हैं कि झारखंड अमीर है, पर यहां के लोग गरीब हैं। यदि हम सिस्‍टम को सुधारने के लिए कारगर पहल नहीं करेंगे, तो ऐसी बातें आगे भी करते रहेंगे। वास्‍तव में यह झारखंड की व्‍यवस्‍थागत अस्मिता पर सवाल है। यदि राज्‍य के किसी भी जिले का कोई भी परिवार घर से वंचित है और उसके सदस्‍यों को ठीक से खाने के लिए भोजन भी नसीब नहीं हो पा रहा, तो यह उस परिवार की कमी भर नहीं, बल्कि सिस्‍टम के जर्जर होने की सच्‍चाई है। जी हां, हम बात कर रहे हैं अपने झारखंड के लातेहार जिले की परसही पंचायत के डुमरिया गांव के विजय मल्‍हार के परिवार की।

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किसी प्रकार से पालते हैं पेट # Latehar

राष्‍ट्रीय और राज्‍य स्‍तर पर चाहे जितने दावे किए जाएं कि गरीबों को आवास मिल गया, खाने के लिए हर माह भोजन मिल जाता है, पर विजय मल्हार का परिवार बदहाली के भयावह दौर से गुजर रहा है। इस परिवार में कुल 18 सदस्‍य हैं। इनमें 8 बच्चे हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों को मिलने वाले आवास इस परिवार को आज तक नसीब नहीं हुए हैं। लाचार होकर सभी लोग पेड़ के नीचे सो रहे हैं। गांव में रोजगार नहीं मिलता है। इसलिए अन्‍य गांवों में घूम-घूम कुछ काम कर किसी प्रकार से अपना पेट पालते हैं।

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नहीं मिलता जनजातीय योजनाओं का लाभ

देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है, मगर इस परिवार के बच्चों को स्कूल नसीब नहीं है। इतनी गरीबी है कि विजय अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं। सरकार और अधिकारियों के सभी दावे इस परिवार के लिए कागजों तक सिमट कर धरे रह जाते हैं। भोजन का अधिकार कानून लागू है, परंतु इस परिवार को खाने के लिए भरपेट भोजन मयस्‍सर नहीं है। वर्तमान में इस परिवार के सभी सदस्‍य भुसूर पंचायत के केंदुआही गांव में महुआ के पेड़ के नीचे सोते हैं। गरीबों को ठंड में कंबल दिए जाते हैं, मगर इस गरीब परिवार को आज तक एक कंबल तक नहीं मिल सका।  विजय मल्हार का कहना है कि मैं आदिवासी हूं। आदिवासियों के लिए कई योजनाएं चलती हैं, पर उनके परिवार को कोई लाभ नहीं मिलता है।

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