Chaibasa : सूरज उगने से पहले ही चाईबासा की घाटियों में एक सन्नाटा पसरा हुआ था। पेड़ों के पत्ते भी जैसे किसी अनजाने भय से कांप रहे थे। छोटानागरा के घने जंगलों में झारखंड जगुआर और कोबरा बटालियन के कदम दबे पांव बढ़ रहे थे। माओवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने की एक और साहसी कोशिश। हवा में बारूद की गंध नहीं थी, मगर ज़मीन के नीचे एक मौत छिपी थी—IED की शक्ल में। और जैसे ही एक जवान का पांव उस ज़मीन पर पड़ा, हवा कांप गई, जंगल चीख पड़ा, और सन्नाटे का सीना चीरता एक विस्फोट हुआ।
वो जवान गिरा तो सही, मगर हिम्मत नहीं टूटी।
उसका शरीर घायल हुआ, लेकिन उसकी आंखों में मिशन की आग अभी भी जल रही थी। साथी दौड़े, प्राथमिक इलाज हुआ। वायरलेस पर संदेश उड़ा—”एक जवान घायल, एयरलिफ्ट की ज़रूरत है।” और अब वो रांची की ओर हेलीकॉप्टर में उड़ रहा है—उस ज़िंदगी की ओर, जिसे उसने देश के लिए दांव पर लगा दिया।
जिस दुश्मन की तलाश थी, उसी की ज़मीन ने धोखा दिया
इस हमले के पीछे वही नाम है—अनल, इनामी माओवादी, जिसकी तलाश में दस्ते निकले थे। मगर अनल ने सिर्फ जंगल को हथियार नहीं बनाया, बल्कि ज़मीन को भी बारूद से भर दिया था। वो बारूद किसी बम की तरह नहीं, एक कायर साजिश की तरह फटा।
डीआईजी की मुहर और जवानों का जवाब
कोल्हान रेंज के DIG मनोज रतन चौथे ने घटना की पुष्टि की है। और इसके बाद जवानों ने ऑपरेशन की रफ्तार बढ़ा दी है—अब यह सिर्फ खोज नहीं, जवाब है।
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