Ranchi : रांची के कोकर में रोड पर खड़े थे नगेंद्र दादा। आंखें धुंधली हो चली थीं, लेकिन देशभक्ति की लौ अब भी टिमटिमा रही थी। कांपते ओठ और लाठी जमीन पर टिकाये कह रहे थे, “हमरे बबुआ भी 1971 में लड़े थे, पाकिस्तान के खिलाफ। अब ये 26 जवान, हमार पोता जैसे… शहीद हो गये। बेटा, ये जो लौ है न, ई सादी नहीं… ई अग्निपथ है।” दादा की आवाज में ग़ुस्सा था, कोई न डर… बस एक ठहराव था। जैसे कह रहे हों – “हम बूढ़े हो गये हैं, पर देश के लिये खड़े हैं आज भी।” रामप्यारी चाची, जो हमेशा मंदिर की आरती करती हैं, आज बिना चूड़ी-बिंदी के थीं। उन्होंने बिंदी नहीं लगाई थी क्योंकि…“आज 26 बहुएं विधवा हुई हैं… तो हम कैसे सजे-संवरे रहते बेटा?” उनकी गोदी में मुन्ना खेल रहा था, लेकिन उनका ध्यान कहीं और था। उन्होंने धीरे से कहा, “हमरे टोले के लड़के भी सेना में हैं। रात भर नींद नहीं आती। और आज जब देखा कि जवानों की बीवियों ने सिर्फ बिंदी हटाकर जान बचाने की कोशिश की… तब लगा कि आतंकवाद हमारे आंगन तक आ गया है।” पांचवीं में पढ़ने वाला सोनू, जिसे बस रंग-बिरंगे गुब्बारे पसंद थे, आज पहली बार गंभीर था। बोला, ”चाचा, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा ना… मैं भी फौज में जाऊंगा। पर गोली चलाऊंगा नहीं… सबको दोस्त बना दूंगा।” सोनू की आंखों में सपना था – एक ऐसा भारत, जहां फिर कोई मां बिंदी छुपाकर बचने की कोशिश ना करे। जहां सैनिक शहीद नहीं, जिंदा लौटें।
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