Garhwa : गढ़वा की शाम कुछ खास थी, कल्याणपुर का होटल शिवाय, उस रोज सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, जज्बातों की छतरी बन गया था। फूलों की माला और अंग वस्त्र में लिपटे पुलिस अफसर दीपक कुमार पांडेय जब मंच पर आये तो ऐसा लगा जैसे किसी घर का मुखिया अलविदा कहने आया हो। मंच पर तालियां थीं, लेकिन आंखों में नमी भी। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश नलिन कुमार ने कहा, इस अफसर पर, जिसने कानून की गरिमा को कभी नहीं गिरने दिया। DDC पशुपति नाथ मिश्रा की आवाज में गर्व था, उस पुलिस कप्तान पर, जिसने गांवों की प्यास बुझाई थी, हथियार नहीं चमकाये थे। राज महेश्वरम बोले, ‘यह विदाई नहीं, एक युग का अंत है।’ जंगलों से लेकर अदालतों तक, जहां भी दीपक पांडेय की छाया गई, वहां न्याय, शांति और भरोसे का सूरज उगा। बूढ़ा पहाड़ की वीरानियां भी उनके कदमों से रौशन हुईं। नक्सलियों की धमक कम हुई और आमजन की धड़कनें बढ़ीं। और जब दीपक बोले तो सन्नाटा छा गया। “गढ़वा ने मुझे जितना दिया, शायद ही कोई जिला दे पाये। ये सिर्फ मेरी पोस्टिंग नहीं थी, ये मेरे जीवन की तपस्या थी। जब मैंने चार्ज संभाला था, JJMP की बंदूकें गरज रही थीं, लेकिन आज वे खामोश हैं।” तालियां बजीं, लेकिन कुछ दिल भी भीग गये। पुलिस और प्रशासन के हर चेहरे पर गर्व था, मगर आंखें नम थीं। फूलों से सजी विदाई मेज पर जब अंगवस्त्र रखा गया, तो हर किसी को एहसास हुआ, एक अफसर जा रहा है, लेकिन उसकी परछाइयां यहीं रहेंगी।
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