Kohramlive : वह फरवरी 2020 की एक सुबह थी। गांव में कोहरा छाया था और हर देहरी पर खामोशी पसरी थी। तभी एक चमचमाती कार गांव की पगडंडी पर रुकी। उतरते ही सफेद कुर्ता-पायजामा पहने एक शख्स ने चारों तरफ देखा, जैसे कोई भूला हुआ अतीत उसे बुला रहा हो। यही था डॉ. देवेंद्र शर्मा, जिसे अब पूरा देश डॉक्टर डेथ के नाम से जानने लगा है। गांव वालों ने देखा था उसे। बस आधा घंटा रुका था वह। मुस्कराया, कुछ पुराने रिश्तेदारों से मिला और बोला, “पेरोल पर छूटकर आया हूं… लेकिन चिंता न करो, अब सब ठीक है।”
डॉक्टर की कलम से कत्ल की कहानी
BAMS की डिग्री लेकर जिसने कभी इलाज करना सीखा, वही बना मौत का सौदागर। 100 से ज्यादा हत्याओं का आरोपी! बिहार से राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक उसकी कहानियां खून से लिखी गई थीं। उसके हाथों में कभी स्टेथोस्कोप था, अब उसकी उंगलियों पर लाशों की स्याही थी। शातिर इतना कि अपराध की दुनिया में उतरने से पहले ही बीवी से तलाक करवा लिया, ताकि पुलिस के शिकंजे से पत्नी और बच्चे बच सकें। लेकिन जब बच्चों की बात आई, तो उसी डॉक्टर डेथ की आंखों में नरमी आ जाती थी। बड़ा बेटा पुणे से MBBS कर रहा है, छोटा बेटा इंजीनियर बनने की राह पर है। महाराष्ट्र में कहीं छुपकर पढ़ाई कर रहे हैं, बाप के साये से दूर, लेकिन उसकी कमाई से पलते हुये। गांव वालों ने बताया, जब वह गांव आया था तो धर्म की बातें करता था। “पाप का फल इसी जन्म में मिलता है…” कहकर ज्ञान बांटता रहा। उसकी बातों में फकीरी थी, पर आंखों में शिकारीपन। “भूखे को खाना खिलाना पुण्य है,” यह कहने वाला कभी इंसानों को मौत के कुएं में ढकेलता था और उनकी गाड़ियों को बेचकर दौलत बटोरता था। पत्नी अब उससे अलग है, लेकिन बेटे उसी के पास थे। उन्हें डॉक्टर-इंजीनियर बनाने का सपना देखता था वह। हरियाणा की भोंडसी जेल से पेशी पर आते वक्त पत्नी मिलने आती थी, रोटी-पानी साथ लेकर। वह गांव आया तो जमीन बेचने की नीयत से। अतरौली तहसील में दो भाइयों को अपना हिस्सा बेंचकर गया। शायद ये उसका आखिरी जुड़ाव था अपनी जड़ों से। अब SP अमृत जैन का कहना है, “उसने गांव की सारी संपत्ति बेच दी है। उसके अपराध से कितनी दौलत कमाई गई, उसकी जांच हो रही है।” उसके गांव में अब भी लोग उसका नाम लेने से कतराते हैं। रिश्तेदार, पड़ोसी, सब मौन हैं। क्योंकि एक सच जो सब जानते हैं, वो ये कि कोई मामूली इंसान इतनी बड़ी जुर्म की कहानी नहीं रच सकता। वह जब-जब लौटा, गांव की मिट्टी सिहर उठी। और जब अब वो राजस्थान में पकड़ा गया, तो जैसे गांव ने राहत की सांस ली, मगर डर की छाया अब भी दीवारों पर टंगी है।
“डॉक्टर डेथ” की मौत की मंडी
रात का सन्नाटा सिर्फ गांव में नहीं, देवेंद्र शर्मा के भीतर भी पसरा था। वो सर्जरी की पढ़ाई करके लौट चुका था, लेकिन नियति के ऑपरेशन टेबल पर खुद ही चीर-फाड़ करने लगा था। अलीगढ़ से लेकर दिल्ली और राजस्थान तक, उसका असली क्लीनिक कहीं और चल रहा था, एक ऐसी हत्या की फैक्ट्री, जहां आदमी जाता तो था जिंदा, पर लौटता सिर्फ रजिस्टर में “गायब” होकर। वर्ष 2002 से 2006 तक, देवेंद्र शर्मा की जिंदगी ने वह मोड़ लिया, जहां वो डॉक्टर नहीं रहा, ‘डॉक्टर डेथ’ बन गया। उसने टैक्सी चालकों की हत्या की ऐसी स्कीम बनाई, जिसे सुनकर रूह कांप जाये।
दिल्ली-एनसीआर में रात के अंधेरे में अगर कोई टैक्सीवाला सवारी लेकर निकलता और फिर गायब हो जाता तो उसकी गुमशुदगी दरअसल “डेथ प्लान” का हिस्सा होती। उसका तरीका साफ था, बेरहम था और नायाब था, किसी एजेंट के जरिए टैक्सी ड्राइवर को बुलवाना। उसे बीस-तीस हजार रुपये में टैक्सी समेत “खरीद” लेना। फिर किसी सुनसान जगह ले जाकर गला घोंटना या सिर पर वार करके मार देना। शव को यमुना या नहर में फेंक देना। वहीं, गाड़ी को कबाड़ के नाम पर बेच देना। हर हत्या से उसे मिलते थे 20 से 25 हजार रुपये। जिस्म मिटता गया, पैसा बनता गया। वहीं, पुलिस की फाइलों में सिर्फ लापता ड्राइवरों की लिस्ट लंबी होती गई।
राजस्थान के धौलपुर में उसने एक पार्टनर के साथ मिलकर फर्जी गैस एजेंसी भी खोली थी, नाम था “Om Sai Ram Gas Agency”। लेकिन यह एजेंसी नहीं, लाशें गायब करने की गुप्त प्रयोगशाला थी। जहां गाड़ियों को काटा जाता, इंजन और बॉडी को अलग किया जाता, और सबूतों को जला दिया जाता। वहां लाशें नहीं रखी जाती थीं, वहां सिर्फ निशान मिटाये जाते थे। देवेंद्र अकेला नहीं था। वह अपने नेटवर्क में झारखंड, बिहार, हरियाणा और दिल्ली के अपराधियों को शामिल करता। उसने पार्टीशन की तरह हर काम बांट रखा था, जैसे कौन ड्राइवर लायेगा, कौन मारेगा, कौन कबाड़ खरीदेगा और पुलिस से कैसे बचा जायेगा। एक बार उसने पुलिस को खुद बताया था, “मैंने 100 से ज्यादा टैक्सी ड्राइवर मार डाले। कोई अफसोस नहीं, क्योंकि वे सिस्टम में गुमनाम थे। किसी ने नहीं पूछा।” दिलचस्प यह कि इसी खून के पैसों से वो अपने बेटों को डॉक्टर और इंजीनियर बनाना चाहता था। पुणे और नागपुर की उन फीस रसीदों में अनगिनत ड्राइवरों की चीखें दर्ज हैं, जो कभी घर नहीं लौटे।
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