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सिर्फ Vaccine के भरोसे कोरोना से नहीं लड़ी जा सकती जंग

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  • Vaccine बनाने वाली कंपनियां कर रही तरह-तरह के दावे
  • कोई स्वतंत्र रिसर्च सामने नहीं आया है, जिसमें Vaccine के 50% से ज्यादा कारगर होने की बात हो

कोहराम लाइव डेस्क: कोरोना वायरस से परेशानी को लेकर पूरी दुनिया एक कारगर टीके का बेसब्री से इंतजार कर रही है। ऐसे में टीका तैयार करने के अंतिम चरण में पहुंचीं कई नामी कंपनियां अपनी दवा 90 से 95 फीसदी तक असरदार होने का दावा कर रही हैं। सच्‍चाई यह है कि अभी तक ऐसी कोई स्वतंत्र रिसर्च सामने नहीं आया है, जिसमें यह कहा गया हो कि कोरोना की Vaccine 50% से ज्यादा कारगर होगी। WHO यानी वर्ल्‍ड हेल्‍थ ऑर्गनाइजेशन भी कह चुका है कि केवल टीके के भरोसे हम कोरोना से जंग नहीं लड़ सकते। कंपनियों के दावे धरातल पर कितने सही साबित होंगे, ये तो वक्त बताएगा। हां, दावों की बदौलत इनके शेयर रातोंरात चढ़ गए। कोरोना की वैक्सीन का दावा करने के बाद फाइजर का शेयर एक साल के उच्च स्तर पर पहुंच गया। वहीं, हेस्टर बायोसाइंसेज के शेयर तीस दिन में 35 फीसदी चढ़ चुके हैं।

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Vaccine को लेकर कंपनियों के दावे

फाइजर-बायोएनटेक

  • पहली Vaccine के बारे में दावा है कि यह 90 फीसदी तक कारगर है।
  • यह वैक्सीन दुनिया की बड़ी दवा कंपनी फाइजर और बायो एनटेक ने मिलकर तैयार की है।
  • इसका तीसरे चरण का ट्रायल यूरोप और उत्तरी अमेरिका के विभिन्न शहरों में हो चुका है।
  • कंपनी का दावा है कि वह ब्रिटेन के बाजार में क्रिसमस से पहले अपनी वैक्सीन उतार देगी।

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मॉडर्ना

  • अमेरिकी कंपनी के Vaccine ट्रायल के नतीजों के अनुसार, यह 94.5 फीसदी तक कामयाब है।
  • तीसरे चरण का ट्रायल वाशिंगटन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट में 30 हजार लोगों पर किया गया।
  • कंपनी इस साल के अंत तक बाजार में सौ करोड़ खुराक उपलब्ध कराएगी।

स्पूतनिक-5

  • रूस द्वारा तैयार हो रहे ‘स्पूतनिक-5’ टीका परीक्षण में 92 प्रतिशत तक प्रभावी पाया गया।
  • टीके के तीसरे चरण के परीक्षण में 40 हजार से अधिक वॉलंटीयर्स पर अध्ययन किया गया।
  • रूस की सरकार ने इस स्पुतनिक-पांच को दुनिया की पहली कोविड-19 वैक्सीन बताया था।
  • भारत में वितरण को डॉ रेड्डीज और रूस के गेमलया इंस्टीट्यूट ने समझौता किया है।

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सिनोवैक बायोटेक

  • चीन की फार्मा कंपनी सिनोवैक बॉयोटेक की वैक्सीन आख़िरी चरण में पहुंच चुकी है।
  • कोरोना वैक नाम की इस वैक्सीन का फिलहाल नौ हजार वॉलंटीयर्स पर ट्रायल हो रहा है।
  • एक ट्रायल वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल प्रॉडक्टस में भी जारी है।

ऑक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी-एस्‍ट्रोजेनेका

  • यह वैक्सीन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया मिलकर बना रही हैं।
  • फेज-3 का ट्रायल ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और द जेनर इंस्टीट्यूट में पूरा कर लिया गया है।
  • इंसानी परीक्षण के लिए कपंनी की ओर से अमेरिका और भारत को चुना गया था।
  • भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया व अन्‍य देशों में इसे बाजार में लाने की अनुमति का इंतजार है।

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सक्षम हैं भारतीय कंपनियां

बाजार में वैक्सीन आने के बाद भी इसकी सफलता को लेकर संशय बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसी क्रेडिट सुईस की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय कंपनियां देश की जरूरत के लायक वैक्सीन डोज बनाने में सक्षम हैं। लेकिन, इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण वैक्सीन आने के बाद एक साल में टीकाकरण अभियान एक तिहाई ही हो पाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक देश की अधिकतर आबादी को टीका लगाने के लिए भारत को 170 करोड़ डोज की जरूरत होगी। भारतीय कंपनियां 240 करोड़ डोज बना सकती हैं।

टीके की सफलता पर सवाल

रॉयल सोसायटी के शोधकर्ताओं ने चेताया है कि हमें तार्किक और व्यावहारिक होने की ज़रूरत है। टीका असल में कितना कारगर होगा, यह उसके बाजार में आने के बाद ही पता लगेगा। इंपीरियल कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों ने टीके की सफलता को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, कई बार टीका आने के बावजूद हमें विफलता हाथ लगती है।

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