Islamabad: पाकिस्तान में नेशनल असेंबली भंग होने के बाद सियासी उठापटक जारी है। इस मामले में रात आठ बजे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कोई भी सरकार संविधान से ऊपर नहीं है। यह सरकार यही बात भूल गई थी। फैसला सुनाने से पहले चीफ जस्टिस ऑफ पाकिस्तान ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर से बातचीत की थी। इलेक्शन कमीशन ने कहा कि हम किसी भी वक्त चुनाव कराने के लिए तैयार। सरकार किसी की वतन परस्ती पर सवाल नहीं उठा सकती। आप किसी को मुल्क का गद्दार कैसे कह सकते हैं। कोर्ट ने कहा- आपने NSC की मीटिंग को सीक्रेट बताया है। हमें भी उसकी डीटेल्स नहीं देते। ये बताएं कि इतनी बड़ी मीटिंग में फॉरेन मिनिस्टर और NSA शामिल क्यों नहीं हुए? वो तो इस्लामाबाद में ही मौजूद थे। कोर्ट ने आगे कहा कि अब हम कोई तर्क नहीं सुनेंगे। जो गैरकानूनी है और संविधान के खिलाफ है- हम उससे कोई बात नहीं करेंगे। 9 अप्रैल को संसद का सत्र बुलाएं और रात 10 बजे के पहले फैसला सुनाए। अगर सरकार हार जाती है तो जितनी जल्द हो सके नई सरकार बनाने का प्रॉसेस शुरू करें।
28 मार्च को खारिज हो गया था अविश्वास प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच के सामने अटॉर्नी जनरल ने कहा- NSC (नेशनल सिक्योरिटी कमेटी) की बैठक से जुड़ी बातें सबके सामने कोर्ट में नहीं रखी जा सकतीं। उन्होंने दावा किया कि अविश्वास प्रस्ताव तो 28 मार्च को ही खारिज कर दिया गया था।पांच जजों की बेंच में शामिल जस्टिस मंदोखेल ने कहा- अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला तो डिप्टी स्पीकर कासिम सूरी ने सुनाया, लेकिन उस पर हस्ताक्षर स्पीकर असद कैसर के कैसे हो गए।
पाकिस्तान में चुनाव कराने पर खर्च होंगे अरबों रुपये
पाकिस्तान के संविधान के हिसाब से हो रहा, तो दिक्कत कहां है। राष्ट्रपति आरिफ अल्वी के वकील अली जफर ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा। चीफ जस्टिस ने जफर से पूछा- अगर सब संविधान के हिसाब से ही चल रहा है तो फिर परेशानी कहां है।अविश्वास प्रस्ताव को खारिज करना अनुच्छेद 95 का उल्लंघन है। अब अगर देश में चुनाव कराए गए तो इसमें अरबों रुपये का खर्च आएगा।

विपक्ष करेगा पूरे देश में प्रदर्शन
विपक्षी दलों के संगठन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) के चीफ मौलाना फजल-उर-रहमान ने बुधवार रात साफ कर दिया था कि गठबंधन अब कोर्ट के अलावा सड़कों पर भी इमरान खान का मुकाबला करेगा। रहमान ने एक चैनल से बातचीत में कहा- जिस तरह से अविश्वास प्रस्ताव खारिज किया गया और जिस तरह से नेशनल असेंबली को भंग किया गया, उससे ये साफ हो जाता है कि इमरान का संविधान में यकीन नहीं है और वो सिर्फ सत्ता से चिपके रहना चाहते हैं।
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