जमशेदपुर : डिजिटल युग में भी अंधविश्वास हावी है। पूर्वी सिंहभूम के ग्रामीण इलाकों में आस्था के नाम पर अंधविश्वास का खेल जारी है। मकर संक्रांति के एक दिन बाद वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार मां की गोद में ही बच्चों को गर्म सलाखों से दागा जाता है। इस दौरान असहनीय दर्द से बच्चे चीखते हैं, तड़पते हैं, मगर मां और परिजनों के चेहरे पर एक सुकुन दिखता है। ऐसी मान्यता है कि बच्चे का दगा पेट उसकी पेट की बीमारियों को दूर कर देगा। वर्षों पुरानी यह परंपरा कई बार बच्चों की जान तक ले लेती है, मगर आस्था के नाम पर अंधविश्वास का ये खेल जारी है।
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क्या है परंपरा
मकर संक्रांति के दूसरे दिन सुबह आदिवासी बहुल इलाके में ओझा अलाव जलाते हैं, उसमें चार मुंह वाले सलाख को तपाते हैं। वहीं एक खाट बिछी होती है, जिसमें बच्चे को लिटाया जाता है। जिसके बाद बच्चे की नाभि के आसपास चार जगहों पर सरसों का तेल लगाकर उसमें गर्म सलाखों से दाग लगाए जाते हैं। इस दौरान बच्चा तड़पता है, जोर-जोर से चीखता है। मगर परिजन सुकुन महसूस करते हैं। माना जाता है कि पेट दगाने के बाद बच्चे के पेट की बीमारी दूर हो जाती है।
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