Ranchi : जीने की चाहत थी, मरना नहीं चाहता था, दो छोटे-छोटे बच्चे और बीवी है। बिहार के नवादा में डॉक्टरों ने हाथ खड़ा कर दिया। बेहतर इलाज के लिए 30 अप्रैल को रांची आया। 22 अप्रैल को कोरोना पॉजिटिव हुए थे। बहुत मुश्किल से अपने परिचित की पैरवी से रांची के एक प्राइवेट अस्पताल में बेड तो मिला, पर ऑक्सीजन नहीं। डॉक्टरों ने कहा… आपको रोज 2 से 3 लीटर ऑक्सीजन की जरूरत है। आपकी सांस उखड़ रही है। बाजार में ऑक्सीजन का मिलना मुश्किल। अब कहीं और अपना इलाज कराएं।
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फिर किसी तरह दूसरे प्राइवेट अस्पताल में एक बेड मिला। कुछ दिनों तक इलाज चला पर ऑक्सीजन के नाम पर रोज 20 से 25 हजार का बिल बनाया जा रहा था। तभी किसी एक अनजान से जाना कि झारखंड सरकार ने कोरोना पॉजिटिव पेशेंट के लिए रांची के सदर अस्पताल में बेहतर इंतजाम कर रखा है। किसी तरह यहां के डॉ अजीत से संपर्क किया। 2 मई को सदर अस्पताल में भर्ती हुए। पेशेंट की जीने की चाह को देखते हुए डॉक्टरों ने ठाना और उन्हें दिलासा दिया कि कोई कसर नहीं छोड़ेंगे आपके इलाज में। दिन रात नहीं देखा गया। सदर अस्पताल के डॉक्टरों ने दम क्या लगाया मुन्नी देवी की मांग सुनी होने से बच गई। 57 दिनों के बाद जो नतीजा सामने आया उसे देख डॉ अजीत की टीम और पेशेंट पुरुषोत्तम का पूरा परिवार बेहद खुश।
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