नहाते ही बदन पर रेंगते हैं छोटे-छोटे कीड़े… देखें वीडियो

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Ranchi(Akhilesh Kumar) : रांची से सटे नामकुम के लालखटंगा पंचायत के घने जंगलों के बीच बसा गोविंदपुर गांव इन दिनों प्यास की ऐसी दास्तान लिख रहा है, जिसे सुनकर पत्थर भी पिघल जाये। यहां रहने वाले आदिवासी मुंडा परिवारों की जिंदगी अब पानी की हर बूंद पर अटक गई है। गांव में केवल एक चापाकल है, लेकिन डेढ़ महीने से वह भी खराब पड़ा है। कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के दरवाजे खटखटाये  गये, फरियाद की गई, मगर गांव की प्यास शायद सरकारी फाइलों में कहीं दबकर रह गई। नतीजा यह हुआ कि अब पूरा गांव जंगल के बीच मौजूद एक “डाढ़ी चुआं” के भरोसे जिंदगी काटने को मजबूर है। भोर होते ही गांव की औरतें, बच्चे और बुजुर्ग बर्तन लेकर चुआं की ओर निकल पड़ते हैं। दिन का बड़ा हिस्सा सिर्फ पानी जुटाने में गुजर जाता है। बच्चों की पढ़ाई छूट रही है, घर के जरूरी काम रुक रहे हैं और जिंदगी पानी की कतार में खड़ी नजर आती है। सबसे दर्दनाक तस्वीर यह है कि जिस चुआं से ग्रामीण पानी भरते हैं, उसी में पालतू और जंगली जानवर भी मुंह लगाते हैं। वही पानी इंसान की प्यास बुझाता है, वही जानवरों की भी। गंदगी इतनी कि लोग कपड़े से छानकर किसी तरह उसे पीने लायक बनाते हैं। मगर मजबूरी का पानी कब बीमारी बन जाये, इसका डर हर पल बना रहता है। ग्रामीण बताते हैं कि दूषित पानी पीने से गांव में लोग बार-बार बीमार पड़ रहे हैं।

गांव के पास एक और चुआं है, जहां लोग नहाने जाते हैं। लेकिन उसकी हालत तो और भी भयावह है। कचरे और गंदगी से भरे उस पानी में नहाने के बाद शरीर पर छोटे-छोटे कीड़े रेंगने लगते हैं।ग्रामीण बताते हैं कि दो साल पहले गांव में डीप बोरिंग और जलमीनार का काम शुरू हुआ था। लोगों की आंखों में उम्मीद जगी थी कि अब गांव की तस्वीर बदलेगी। लेकिन वह सपना अधूरा रह गया। न टंकी लगी, न मशीन चली और न ही गांव तक पानी पहुंच पाया। जंगल के बीच अधूरी जलमीनार आज भी सरकारी वादों की टूटी हुई मिसाल बनकर खड़ी है।

मुसीबत सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है। गांव तक जाने वाली सड़कें भी गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। बारिश के दिनों में हालात और बदतर हो जाते हैं। बीमार को अस्पताल ले जाना हो या बच्चों को स्कूल भेजना, हर कदम संघर्ष बन जाता है। सुनें क्या बोले ग्रामीण

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