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इंसानी हड्डियों से सज गया यह कब्रिस्‍तान, जानें क्‍यों है डरावना

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कोहराम लाइव डेस्क : किसी जगह को सजाना हो तो हम फूलों का इस्‍तेमाल करते हैं या कोई और सजावटी सामान का। किसी मंदिर की बात हो, मस्जिद की बात हो या चर्च की, सजावट का दृश्‍य इंसान को लुभाएगा। आकर्षित करेगा। इसके विपरीत यदि सजावट का अंदाज और सजावटी सामान डरावना हो तो आश्‍चर्य होना स्‍वाभाविक है। डर तो लगेगा ही। जी हां, हम बात कर रहे हैं चेक गणराज्‍य की राजधानी प्राग में स्थित एक चर्च का, जिसका नाम है सेडलेक ऑस्युअरी। इसे इंसानों की अस्थियों यानी बोन से सजाकर भयावना बना दिया गया है। फिर भी एक अनुमान के अनुसार, सालाना इसे देखने के लिए दो लाख से भी ज्यादा लोग आते हैं।

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छत से लेकर झूमर तक बने हैं हड्डियों से

बताया जाता है कि इस चर्च की छत से लेकर झूमर तक सब कुछ इंसानी हड्डियों से ही बनाए गए हैं। यही वजह है कि इसे ‘चर्च ऑफ बोन्स’ के नाम से भी जाना जाता है।

1870 में बना था कब्रिस्‍तान

यह चर्च आज से करीब 150 साल पहले यानी 1870 में बना है। इंसानी हड्डियों से इस चर्च को सजाने के पीछे एक बेहद ही रहस्यमय कारण है। सन् 1278 में बोहेमिया के राजा ओट्टोकर द्वितीय ने हेनरी नाम के एक संत को ईसाईयों की पवित्र भूमि यरुशलम भेजा था। दरअसल, यरुशलम को ईसा मसीह की कर्मभूमि कहा जाता है। यहीं पर उन्हें सूली पर भी चढ़ाया गया था।

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कब्रिस्‍तान पर डाल दिया पवित्र मिट्टी को

कहा जाता है कि यरुशलम गए संत जब वापस लौटे तो वो अपने साथ वहां की पवित्र मिट्टी से भरा एक जार भी लेकर आए। उस मिट्टी को एक कब्रिस्तान पर डाल दिया। बस उसके बाद से यह लोगों के दफनाने की पसंदीदा जगह बन गई। कब्रिस्तान में पवित्र मिट्टी होने की वजह से लोग चाहते हैं कि मरने के बाद उन्हें वहीं पर दफनाया जाए और ऐसा होने भी लगा।

महामारी में मारे गए अनेक लोग    

14वीं सदी में ‘ब्लैक डेथ’ महामारी फैल गई थी। इस वजह से बड़ी संख्या में लोग मारे गए। उन्हें भी प्राग के उसी कब्रिस्तान में दफनाया गया, जहां पवित्र मिट्टी को डाला गया था। 15वीं सदी के  प्रारंभ में बोहेमिया युद्ध में भी हजारों की संख्या में लोग मारे गए। उन्हें भी वहीं पर दफनाया गया। अब  बड़ी संख्‍या में लोगों को दफनाने की वजह से कब्रिस्तान में जगह नहीं बची। इसलिए उनके कंकालों और हड्डियों को निकालकर उनसे चर्च को सजा दिया गया। देखते ही देखते यह चर्च पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गया और बड़ी संख्या में लोग इसे देखने आने लगे। यह सिलसिला आज भी जारी है।

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