फिर बहेगी सरस्वतिया…

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Garhwa(Nityanand Dubey) : गढ़वा की मिट्टी में बसने वाली सरस्वतिया नदी अब केवल लोगों की यादों का हिस्सा बन चुकी है। कभी इसकी कल-कल धारा गांवों की पहचान थी। बच्चों की हंसी, खेतों की हरियाली और घाटों की रौनक इसी नदी से जुड़ी थी। लेकिन वक्त के साथ नदी सिकुड़ती चली गई। कहीं गाद ने रास्ता रोक दिया, तो कहीं अतिक्रमण ने उसकी सांसें छीन लीं। अब गढ़वा प्रशासन ने इस मरती हुई नदी को फिर से जिंदा करने की ठान ली है।

‘आपन सरस्वतिया’ अभियान की शुरुआत

गढ़वा के सदर SDO संजय कुमार ने सरस्वतिया नदी को पुनर्जीवित करने के लिये “आपन सरस्वतिया” अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान का उद्देश्य नदी को अतिक्रमण मुक्त बनाना, साफ-सुथरा करना और फिर से अविरल बहाव देना है। प्रशासन अब इस मुहिम को जनआंदोलन का रूप देने की तैयारी में जुट गया है।

80 अतिक्रमणकारियों को नोटिस

सरस्वतिया नदी के अस्तित्व को बचाने के लिये प्रशासन ने बड़ा कदम उठाते हुये करीब 80 लोगों को नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई पूर्व में किये गये सर्वे और स्थानीय लोगों से मिले फीडबैक के आधार पर की गई है। प्रशासन ने साफ कहा है कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में कब्जा किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।

नदी खत्म हुई तो पहचान भी खत्म हो जायेगी

SDO संजय कुमार ने सख्त लहजे में कहा कि अगर अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं हुई, तो धीरे-धीरे नदी का वजूद ही खत्म हो जायेगा। उन्होंने बताया कि सभी चिन्हित लोगों को 10 दिनों के भीतर जवाब देने का मौका दिया गया है। यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी जायेगी। नदी की सफाई, गाद हटाने और जलधारा को फिर से जीवित करने के लिए सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय स्वच्छता कार्यकर्ताओं की मदद भी ली जायेगी। सरकारी विभागों को भी इस दिशा में आवश्यक निर्देश जारी कर दिये गये हैं।

गढ़वा बाजार से लेकर पिपरा कला तक प्रशासन की नजर

जिन इलाकों में अतिक्रमण को लेकर कार्रवाई शुरू हुई है, उनमें गढ़वा बाजार, उंचरी, सोनपुरवा, नगवां, दिपुआं, जोबरइया, पिपरा कला जैसे इलाके शामिल हैं। इन क्षेत्रों में नदी के प्रवाह क्षेत्र पर स्थायी और अस्थायी कब्जे की शिकायतें सामने आई थीं। प्रशासन की इस पहल से पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों में खुशी का माहौल है। लोगों को उम्मीद है कि “आपन सरस्वतिया” अभियान सिर्फ सरकारी कार्रवाई नहीं, बल्कि गढ़वा की पहचान बचाने की मुहिम साबित होगी।

 

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