Ranchi : झारखंड की मिट्टी से उठी एक ऐसी आवाज, जिसने शोषण के खिलाफ बिगुल फूंका, आदिवासियों के अधिकारों के लिये संघर्ष किया और अलग झारखंड राज्य के सपने को हकीकत में बदलने की लड़ाई का नेतृत्व किया। उसी जननायक, उसी ‘गुरुजी’ यानी शिबू सोरेन को अब देश मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान से नमन करने जा रहा है। 23 जून को नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मभूषण से सम्मानित करेंगी। यह सम्मान उनकी पत्नी रूपी सोरेन ग्रहण करेंगी। इस अवसर पर उनकी बहू और झारखंड की सक्रिय राजनीतिक शख्सियत कल्पना सोरेन भी मौजूद रहेंगी। भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला पद्मभूषण सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस लंबे संघर्ष का सम्मान है, जिसने झारखंड को उसकी पहचान दिलाई। यह सम्मान उस नेता के नाम है, जिसे झारखंड की जनता प्यार से ‘गुरुजी’ कहती थी और जिसने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा जल, जंगल, जमीन और आदिवासी अधिकारों की लड़ाई को समर्पित कर दिया।
झारखंड की पहचान बन गये थे ‘गुरुजी’
बीते साल 4 अगस्त को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में शिबू सोरेन का निधन हुआ था। उनके जाने के साथ ही झारखंड आंदोलन और आदिवासी अस्मिता की राजनीति का एक स्वर्णिम अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। लेकिन संघर्ष, आंदोलन और जनसेवा की उनकी विरासत आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा है।
महाजनी प्रथा के खिलाफ छेड़ा था आंदोलन
शिबू सोरेन ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत महाजनी प्रथा और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आंदोलन से की थी। टुंडी क्षेत्र में चलाये गये उनके संघर्षों ने उन्हें आम लोगों का नेता बना दिया। धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता संथाल परगना तक पहुंची और फिर पूरे झारखंड आंदोलन का चेहरा बन गई। साल 1980 में दुमका लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुये उन्होंने राजनीतिक इतिहास रच दिया। तमाम बड़े दलों को पीछे छोड़ते हुये उन्होंने जीत हासिल की और संसद पहुंचे। यहीं से झारखंड की राजनीति में ‘गुरुजी’ का प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
हार मिली, लेकिन संघर्ष नहीं छोड़ा
1984 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति लहर थी। लेकिन शिबू सोरेन हारकर बैठने वालों में नहीं थे। उन्होंने जामा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीतकर जोरदार वापसी की।
झारखंड आंदोलन को दी नई धार
1980 और 1990 का दशक झारखंड आंदोलन के लिये निर्णायक रहा। इस दौरान शिबू सोरेन ने अलग राज्य की मांग को गांव-गांव तक पहुंचाया। 1989 में दुमका से लोकसभा चुनाव जीतकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि झारखंड की जनता उनके साथ खड़ी है। इसके बाद कई बार सांसद बने और आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
तीन बार बने झारखंड के मुख्यमंत्री
अलग झारखंड राज्य के गठन के बाद शिबू सोरेन तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनका राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा, लेकिन जनाधार कभी कमजोर नहीं पड़ा।झारखंड की राजनीति में उनका नाम एक संस्था की तरह माना जाता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी, तब भी दुमका की जनता ने शिबू सोरेन पर भरोसा जताया और उन्हें संसद भेजा। हालांकि 2019 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी राजनीतिक और सामाजिक स्वीकार्यता बरकरार रही।
आखिरी सांस तक झारखंड की चिंता
2020 में वह राज्यसभा पहुंचे। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बावजूद झारखंड और आदिवासी समाज के मुद्दों को लेकर उनकी चिंता कभी कम नहीं हुई। 4 अगस्त 2025 को उनके निधन के साथ एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनकी विचारधारा और संघर्ष की कहानी आज भी प्रेरणा देती है।
झारखंड के लिये गौरव का क्षण
शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्मभूषण मिलना झारखंड के लिये गर्व और सम्मान का क्षण है। यह उन लाखों लोगों की भावनाओं का भी सम्मान है, जिन्होंने अलग राज्य के आंदोलन में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर संघर्ष किया था। आज भले ही गुरुजी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनका सपना और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।
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