Kohramlive : एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने लुटियंस दिल्ली में स्थित अपना आलीशान बंगला 1260 करोड़ रुपये में बेच दिया है। तीन एकड़ में फैली यह संपत्ति अब किसी दूसरे कारोबारी परिवार की हो जायेगी, लेकिन इस सौदे ने एक बार फिर साबित कर दिया कि दिल्ली में कुछ पते ऐसे भी हैं, जिनकी कीमत सिर्फ जमीन से नहीं, बल्कि उनके नाम से तय होती है। दिलचस्प बात यह है कि सुभाष चंद्रा ने यही बंगला वर्ष 2015 में लगभग 304 करोड़ रुपये में खरीदा था। महज एक दशक में इसकी कीमत चार गुना से भी अधिक बढ़ गई। यह बढ़ोतरी सिर्फ बाजार की नहीं, बल्कि उस इलाके की प्रतिष्ठा की कहानी भी कहती है।
आखिर क्या है लुटियंस दिल्ली का जादू?
दिल्ली का यह इलाका सिर्फ एक पॉश कॉलोनी नहीं है। यह भारत की सत्ता, संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा का सबसे चमकदार पता माना जाता है। करीब सौ साल पहले अंग्रेज वास्तुकार सर एडविन लुटियंस ने इस इलाके की परिकल्पना की थी। चौड़ी सड़कें, हरियाली से घिरे विशाल बंगले और शाही वास्तुकला, सब कुछ ऐसा कि आज भी यहां कदम रखते ही इतिहास की खुशबू महसूस होती है। आजादी के बाद अंग्रेज तो चले गये, लेकिन उनके बनाये ये बंगले देश के बड़े नेताओं, उद्योगपतियों और प्रभावशाली लोगों के ठिकाने बन गये। यही वजह है कि यहां घर खरीदना केवल संपत्ति खरीदना नहीं, बल्कि देश के सबसे विशिष्ट क्लब में प्रवेश पाने जैसा माना जाता है।
यहां पड़ोसी भी अरबपति होते हैं
भगवान दास रोड पर स्थित इस बंगले के आसपास ऐसे नाम रहते हैं, जिन्हें देश की आर्थिक ताकत का प्रतीक माना जाता है। गौतम अडानी ने भी इसी इलाके में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च कर अपना ठिकाना बनाया। पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा, उद्योगपति नवीन जिंदल, डिक्सन टेक्नोलॉजीज के सुनील वचानी और स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल जैसे नाम भी इसी अभिजात्य दायरे का हिस्सा हैं। कहते हैं कि लुटियंस दिल्ली में सिर्फ घर नहीं होते, बल्कि हर बंगले के भीतर एक कहानी, एक साम्राज्य और एक पहचान बसती है।
1260 करोड़ की कीमत आखिर क्यों?
सवाल उठता है कि आखिर एक बंगले की कीमत 1260 करोड़ रुपये कैसे हो सकती है? जवाब सिर्फ उसकी भव्यता में नहीं, बल्कि उसके पते में छिपा है। कनॉट प्लेस, इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन और संसद से कुछ ही दूरी पर स्थित यह इलाका देश का सबसे प्रतिष्ठित रियल एस्टेट क्षेत्र माना जाता है। यहां जमीन का हर इंच सोने से भी ज्यादा कीमती माना जाता है।यही वजह है कि जब यहां कोई बंगला बिकता है, तो वह सिर्फ एक प्रॉपर्टी डील नहीं रहती, बल्कि राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाती है। 1260 करोड़ रुपये का यह सौदा सिर्फ एक कारोबारी लेन-देन नहीं है। यह उस दिल्ली की कहानी है, जहां कुछ पते समय के साथ और भी कीमती होते जाते हैं। कल तक जिस बंगले के बाहर सुभाष चंद्रा का नाम था, वहां अब कोई और नाम लिखा जायेगा। लेकिन लुटियंस दिल्ली की चमक, उसका आकर्षण और उसकी रहस्यमयी शान शायद कभी नहीं बदलेगी। क्योंकि दिल्ली में कुछ घर ऐसे होते हैं, जिनमें लोग नहीं, इतिहास रहता है।
अनाज मंडी से मीडिया साम्राज्य तक: सुभाष चंद्रा की कामयाबी की कहानी
हर बड़ी कामयाबी के पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी छिपी होती है। एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हरियाणा के हिसार जिले के छोटे से गांव आदमपुर में नवंबर 1950 में जन्मे सुभाष चंद्रा ने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनका नाम देश के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में शुमार होगा। एक साधारण कारोबारी परिवार में जन्मे सुभाष चंद्रा के घर का मुख्य व्यवसाय अनाज व्यापार था। बचपन से ही उन्होंने व्यापार की बारीकियां करीब से देखीं। हिसार में शुरुआती शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पारिवारिक कारोबार में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। लेकिन उनकी महत्वाकांक्षाएं पारंपरिक व्यापार की सीमाओं से कहीं आगे थीं। वर्ष 1981 में उन्होंने पैकेजिंग कारोबार के जरिये उद्यमिता की नई राह पकड़ी। सुभाष चंद्रा की असली पहचान तब बनी, जब उन्होंने मीडिया की दुनिया में कदम रखा। साल 1992 भारतीय टेलीविजन इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। इसी वर्ष सुभाष चंद्रा ने देश का पहला निजी हिंदी सैटेलाइट चैनल ‘जी टीवी’ शुरू किया। उस समय दूरदर्शन का एकाधिकार था, लेकिन जी टीवी ने भारतीय दर्शकों को मनोरंजन और समाचार की एक नई दुनिया से परिचित कराया। देखते ही देखते जी समूह देश के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्क में शामिल हो गया और सुभाष चंद्रा भारतीय मीडिया उद्योग के अग्रणी चेहरों में गिने जाने लगे। व्यापार जगत में अपनी अलग पहचान बनाने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 2016 में वे भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से हरियाणा से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिये निर्वाचित हुये।
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