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मेहंदी कैसे बनी सुहाग और सौभाग्य की पहचान… जानें

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Kohramlive : हाथों पर रची मेहंदी की खुशबू, हथेलियों पर उभरते खूबसूरत डिजाइन और शादी-ब्याह का उत्साह… भारतीय संस्कृति में भावनाओं, परंपराओं और शुभता का प्रतीक बन चुकी है। विवाह हो, तीज-करवा चौथ हो या कोई बड़ा त्योहार, मेहंदी के बिना उत्सव अधूरा-सा लगता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मेहंदी को आज सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, उसका शुरुआती इस्तेमाल सजावट से ज्यादा औषधीय उपचार के लिये किया जाता था?

जब मेहंदी थी एक प्राकृतिक औषधि

इतिहास के पन्ने बताते हैं कि प्राचीन काल में मेहंदी का उपयोग शरीर को ठंडक पहुंचाने, घाव भरने, सिरदर्द कम करने और बालों की देखभाल के लिये किया जाता था। गर्म क्षेत्रों में रहने वाले लोग इसकी ठंडी तासीर का लाभ उठाते थे। यानी मेहंदी की शुरुआत सौंदर्य प्रसाधन के रूप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक उपचार के रूप में हुई थी।

भारत में जन्मी या मिस्र से आई मेहंदी?

मेहंदी की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि भारतीय वैदिक परंपरा में मेहंदी का उल्लेख बहुत पुराना है। धार्मिक अनुष्ठानों, विवाह संस्कारों और उत्सवों में इसके उपयोग के संकेत प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। वहीं दूसरी ओर कई इतिहासकारों का दावा है कि मेहंदी का सबसे प्राचीन उपयोग मिस्र और बेबीलोन की सभ्यताओं में हुआ था। माना जाता है कि मिस्रवासी ममीकरण की प्रक्रिया में मेहंदी का इस्तेमाल करते थे। उनकी मान्यता थी कि मेहंदी आत्मा की रक्षा करती है और उसे आध्यात्मिक सुरक्षा प्रदान करती है।

मुगल दौर में बढ़ा मेहंदी का श्रृंगार

भारत में मेहंदी को कला और सौंदर्य से जोड़ने का श्रेय काफी हद तक मुगल काल को दिया जाता है। मुगल शासन के दौरान हाथों और पैरों पर बारीक डिजाइन बनाने की परंपरा लोकप्रिय हुई। शाही परिवारों से शुरू हुआ यह चलन धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचा और फिर विवाह एवं त्योहारों का अहम हिस्सा बन गया। यही वह दौर था जब मेहंदी सिर्फ औषधि नहीं रही, बल्कि सौंदर्य और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गई।

मेहंदी से पहले महावर का था चलन

भारतीय परंपरा में मेहंदी से पहले महावर या आलता का विशेष महत्व था। विशेषकर महिलाओं के पैरों और हाथों में लाल रंग का महावर लगाया जाता था। पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राधा के चरणों में आलता लगाने का उल्लेख मिलता है। कई देवी-देवताओं की पारंपरिक चित्रकला और मूर्तियों में भी हाथ-पैरों पर लाल महावर दिखाई देता है।

लक्ष्मी, समृद्धि और सौभाग्य से जुड़ी मान्यता

भारतीय संस्कृति में लाल रंग को शुभता, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण महावर और बाद में मेहंदी को भी सौभाग्य से जोड़कर देखा जाने लगा। समय के साथ मेहंदी विवाह संस्कारों का अभिन्न हिस्सा बन गई। आज भी मान्यता है कि दुल्हन के हाथों की गहरी मेहंदी प्रेम, खुशहाली और नये जीवन की शुभ शुरुआत का संकेत मानी जाती है।

क्यों खास है मेहंदी?

● इसकी तासीर ठंडी होती है।
● प्राकृतिक रंग होने के कारण त्वचा पर सुरक्षित मानी जाती है।
● भारतीय विवाह और त्योहारों की प्रमुख परंपरा है।
● सौभाग्य, प्रेम और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
● प्राचीन काल में औषधीय उपयोग के लिए भी प्रसिद्ध थी।

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