रांची (रुपम) : दोनों थे जिगरी दोस्त। भले अब दोनों इस दुनिया में नहीं रहे, पर दोनों के नाम जिंदा हैं अलग-अलग गाथा के लिए। एक जाने जाते हैं यह कहने के लिए कि तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। नाम है इनका सुभाष चंद्र बोस, जिन्हें आज उनके 125वें जन्मदिन पर याद किया गया। नतमस्तक होकर उन्हें नमन किया। दूसरा नाम हैं फणींद्रनाथ चटर्जी का। ये जाने जाते हैं अपनी दोस्ती निभाने के लिए। चटर्जी जैसे जाने कि उनका दोस्त रांची आने वाला है तब अपनी ढाई हजार रुपये में खरीदी फिएट गाड़ी को ऐसा चमकाया कि आज भी उसपर धूल नहीं पड़ा। इस गाड़ी को संजोकर रखे हुए है अपने घर की आंगन में। चटर्जी परिवार की तीसरी पीढ़ी भी अपने दादा की दोस्ती की निशानी का सम्मान करते हुए आज तक संभाल कर रखा है। उनका पोता कहता है कि 15 से 20 दिन बाद रांची के लोग फिर इस गाड़ी को रांची में दौड़ते देखेंगे। इसी गाड़ी से नेता जी रामगढ गए थे। एक अधिवेशन में उन्हें भाग लेना था।
अधिवेशन 18 मार्च से 20 मार्च 1940 तक चला। तब नेताजी रांची में 17, 18 और 19 मार्च 1940 यानी तीन दिनों तक रूके थे। इस दरम्यान वे लालपुर में रहने वाले फणींद्रनाथ आयकत के घर रूके थे। जिस कुर्सी पर बैठे थे वो कुर्सी भी आज सही सलामत है। जब कोई उनके घर में आता है तो बड़े नाज से बताते हैं कि देखो ये वही कुर्सी है जिसपर अपने देश के लाल ‘बोस बाबू’ बैठे थे। लकड़ी की बनी इस कुर्सी में भी धूल का एक कण नहीं आने दिया जाता है। स्वर्गीय आयकत के पोते विष्णु आयकत बताते हैं कि यह कुर्सी तो अब पूजनीय हो गया है।
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