अमेरिका के ‘शाहजहां’ ने अपनी ‘मुमताज’ के लिए खुद को गंगा में झोंका

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  • देखिए कैसे अपनी पत्‍नी की ख्‍वाहिश पूरा करने के लिए अमेरिका से इंडिया के गंगा तट तक आए मोंटी जिमरमैन
  • गंगा कभी मैली न हो, इस पर कर रहे हैं शोध

Ranchi (नीरज ठाकुर / प्रिया) : उस रात सिल्विया बिल्‍कुल गुमसुम और खामोश लेटी पड़ी थीं। बगल में ही पति मोंटी जिमरमैन ने जब उन्हें छुआ और टोका तो पूछने पर सिल्विया के मुख से हौले से सिर्फ इतना निकला कि सुना है कि मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में प्यार की खूबसूरत निशानी ताजमहल बनवा दिया। तुम मेरे लिए क्‍या करोगे। पति कुछ पल उसे निहारता रहा, सुनता रहा और फिर कहा, तुम्‍हीं बताओ मैं क्‍या करूं। तब सिल्विया ने कहा, मेरी आखिरी ख्‍वाहिश है कि जब मैं मरूं तो मेरी अस्थि भारत की पवित्र गंगा नदी में ही प्रवाहित करना। हां, एक बात का ख्‍याल रखना कि गंगा कभी मैली न हो। पत्‍नी की आखिरी ख्‍वाहिश पूरा करने के इरादे से अमेरिका के मोंटी जिमरमैन इंडिया आते हैं, पत्‍नी की अस्थि को वाराणसी में गंगा में पूरी आस्‍था के साथ प्रवाहित करते हैं। वहीं अपने जिगरी दोस्‍त विवेक प्रसाद के साथ इस शोध में लग गए हैं कि ऐसा क्या किया जाये कि गंगा कभी मैली न हो। साफ-सफाई से लेकर बहती गंगा की धारा कहीं रुके नहीं, इस पर मोंटी ने काम करना शुरू कर दिया है। इस काम में खर्च कितना होगा और कहां से आएगा, इसकी उन्‍हें परवाह नहीं है। उनका सिर्फ इतना कहना है कि सबका साथ रहा तो यह असंभव नहीं है।
मोंटी जिमरमैन अमेरिकी सैन्‍य उच्‍च अधिकारी रहे हैं। अमेरिका से ताल्‍लुक रखने वाले मोंटी अपने सेवा काल के दौरान 47 देशों की यात्रा कर चुके हैं। वह 6 भाषाओं के जानकार हैं। वह जार्ज मेसन विश्‍वविद्यालय में पीएचडी शोधकर्ता हैं। उन्‍होंने कहा कि पत्नी की इच्छा और उनकी अस्थियों के गंगा में विसर्जन के बाद भारत और गंगा से उनका स्वतः जुड़ाव हो गया। पत्नी तो नहीं रहीं, लेकिन गंगा के प्रति उनकी आस्था ने उन्हें भी आस्थावान बना दिया। मोंटी की पत्‍नी सिल्विया इंग्‍लैंड में पली-बढ़ी थीं, लेकिन भारतीय संस्‍कृति के प्रति उनका गहरा लगाव शुरू से ही था। मोंटी कहते हैं, गंगा को पहली बार देखने के बाद इसमें फैली गंदगी से मुझे दुख हुआ और रिटायरमेंट के बाद मैंने इसकी सफाई में अपने योगदान का संकल्‍प लिया।
मोंटी ने बातचीत के क्रम में बताया कि 2019 में रिटायर होने के बाद उन्होंने पर्यावरण विज्ञान में पीएचडी करने की ठानी। उन्हें विश्‍वास था कि शोध से जो ज्ञान प्राप्‍त होगा, वह गंगा मां के किनारे रहने वाले और गंगा की सफाई के लिए काम करने वाले लोगों के लिए मूल्‍यवान होगा।

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