Bihar : चाय और कुल्हड़ का रिश्ता वैसा ही है जैसा आलू और समोसे का। कुल्हड़ वाली चाय का सोंधा जायका गजब का होता है। बिहार के भोजपुर में इसका प्रचलन आजकल बढ़ गया है। पहले भी ऐसा ही था,पर बीच में प्लास्टिक के कप में भी चाय पीने का चलन आ गया था। लोग बताते हैं कि जिले में पहले प्रतिदिन 250-300 कप कुल्हड़ वाली चाय की बिक्री होती थी, अब रोजाना यहां लगभग 30 हजार कप कुल्हड़ वाली चाय की बिक्री हो रही है। जिले के कोइलवर स्थित चाय दुकानदार राजा ने बताया कि कुछ साल पहले तक वो प्लास्टिक और कागज के कप में ग्राहकों को चाय देते थे, लेकिन बीते कुछ वर्षों से कुल्हड़ की मांग तेजी से बढ़ी है। इसलिए अब वो कुल्हड़ में ही चाय बेचते हैं। उन्होंने बताया कि कुल्हड़ की चाय बेचने से जहां उनका फायदा होता है, वहीं कुम्हार समाज को भी इसका लाभ होता है।
क्यों बढ़ी कुल्हड़ वाली चाय की बिक्री
कुम्हार दुखन पंडित ने बताया कि सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक से बने कप के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। इस वजह से कुल्हड़ की चाय की मांग तेजी से बढ़ी है। ग्राहकों की मांग को देखते हुए दुकानदार इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं। पहले लोग सिर्फ दीपावली पर दीए व मिट्टी के बर्तन की मांग करते थे, लेकिन अब कुल्हड़ व अन्य बर्तन बनाकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। कुम्हारों की मिट्टी के बर्तन बनाने का कारोबार एक बार फिर से पटरी पर आ गया है।
80 रुपये सैकड़ा दुकानदार को देते हैं कुल्हड़
मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार समाज की माने तो एक ट्रॉली मिट्टी तालाब से निकालने में मजदूरी-भाड़ा आदि मिलाकर लगभग 3,500 रुपये का खर्च आता है। कुल्हड़ बनाकर आग में पकाने का खर्च अलग है। कुम्हार 80 पैसे की लागत के हिसाब से दुकानदार को कुल्हड़ बेचते हैं। दुखन पंडित ने बताया कि पहले हर प्रखंड में चुनिंदा दुकान हुआ करती थी, जहां कुल्हड़ वाली चाय मिलती थी। इन जगहों पर अब अमूमन हर कोई कुल्हड़ में ही चाय की मांग करता है।
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