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न रहम, न करम, सिर्फ भागते हैं “माल” के पीछे

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  • हे भगवान… इन्‍हें माफ करना!
  • नेत्रहीन बैंक अधिकारी का छलका दर्द  
  • दुकानदार मासूम बेटे का निवाला तक थमा देता था एक्‍सपायरी

कोहराम लाइव डेस्‍क : बैंक अधिकारी जेना उरांव अपनी नेत्रहीनता से बिलकुल दुखी नहीं हैं। उनका दुखड़ा यह है कि उनके भरोसे का खून हुआ। जिस दुकान से वे अपने तीन साल के मासूम बच्चे के लिए दूध, हार्लिक्स, टॉफी और अन्य सामान खरीदते थे, वह उन्हें एक्सपायरी थमा देता था। उन्हें भारी धक्का लगा। उनके बच्चे की जान जा सकती थी। उन्होंने ठाना अब सारी खरीदारी आनलाइन। जेना कहते हैं कि रुपया दो रुपया ज्‍यादा ले लेता, पर ऐसा किसी के साथ भी करना काफी दुखद।

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आइए सुनते हैं भरोसे के खून की कहानी, जेना उरांव की जुबानी।

जेना पहले दिल्ली में काम करते थे, लेकिन मां की इच्छा के चलते अपने घर रांची आ गये। वे कहते हैं, सबसे जरूरी है पढ़ना-लिखना। मुझे देख लीजिए, बैंक में बड़े से लेकर छोटे तक हर सहयोगी मेरी सेवा लेते हैं, चाहे मेल भेजना हो या फिर कंप्‍यूटर का कोई और काम। मजा तो तब आता है जब बैंक में रहती है खूब भीड़। जेना उरांव टेक्‍नोलॉजी के सहारे अपना हर काम कर लेते हैं। घर से दफ्तर तक आने-जाने के लिए “रैपिडो”, ऑनलाइन शॉपिंग और पेमेंट तक। जेब में पड़े नोट तक की जानकारी वे टेक्‍नोलॉजी से ले लेते हैं। उनकी जेब में कौन सा नोट कितने का है, यह बता देता है उनका आईफोन। उन्‍हें देख हैरत तब होती है नंबर चाहे जिसका हो, केवल नौ से‍कंड लगता है उन्‍हें कनेक्‍ट करने में।

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जेना उरांव की जीवन संगिनी गुल्पी उरांव भी नेत्रहीन है। जेना ने कहा कि उनकी गुल्‍पी जब जवान थी, तभी चुपके से एक “वायरस” ने आंखों की रोशनी छीन ली। शैक्षणिक परिसर हमारा एक ही था। न जाने कब गुल्‍पी का मैं हो गया, मुझे पता भी नहीं चला। शादी से पहले वह गुल्‍पी को पटाने के लिए मौका-बेमौका गिफ्ट दिया करते थे, पर शादी के बाद गिफ्ट देना बंद कर दिया। हौले से मुस्करा कर कहा- अब भागेगी कहां, क्‍योंकि गुल्‍पी से अब जनम जनम का नाता जो है। वहीं गुल्‍पी ने राज खोला- पहली ही मुलाकात में गिफ्ट में सूट मिला। जबतक प्रेमिका थी, मांगने की जरूरत नहीं पड़ी। पत्‍नी बनते ही सारे गिफ्ट पर ग्रहण लग गये। अब तो इनसे कोई उम्‍मीद भी नहीं रखती। जब कभी रूठती हूं तो उनकी अदा से ही गुस्सा पिघल जाता है। अपने मासूम बेटे के हुलिये के बारे में जेना उरांव कहते हैं- उसकी काया है मेरी तरह और मुखड़ा है मां की तरह। इतना यकीन कैसे, इसके जवाब में कहा- अगर पिता हैं तो ये सवाल नहीं करते।

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शास्त्रों में कहा गया है कि किसी शारीरिक अक्षमता से ग्रस्त व्यक्ति का भरोसा तोड़ना ठीक वैसे ही है, जैसे किसी परास्त व्यक्ति को उलाहना देकर उसका मानमर्दन करना। जेना उरांव ने “उपर वाले” को कभी नहीं कोसा पर “नीचे वालों” ने जो उनके साथ किया वह लहूलुहान कर गया उनका कलेजा।

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