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उम्मीदों का दीया… क्या दिवाली पर इनके घर भी होंगे रोशन

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कोहराम लाइव डेस्‍क : हम दीया से लोगों का घर रोशन करते हैं, लेकिन हमारा घर अंधेरा ही रह जाता है। मिट्टी के दीये और अन्य सामान बनाने का हुनर हमारे पूर्वजों से हमें मिला है, लेकिन इस विरासत को महफूज रखना अब भारी पड़ रहा है। क्या करें, घाटे का व्यापार है, लेकिन यही हमारी पहचान है। फिर से दिवाली आयी है, लोगों के घर तो रोशन होंगे, लेकिन हमारे दिल खाली हैं, गरीबी का अंधेरा है। हम अपनी विरासत नहीं छोड़ सकते, पर यह विरासत मिट्टी में मिलती जा रही है। हम ऐसी दहलीज पर खड़े हैं, जहां किसी की नजर नहीं जाती। मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों पर एक रिपोर्ट।

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एक बार फिर उम्मीद का दीया रोशन है, दीया बनाने वाले कुम्हारों के घर में। इनके घरों का पूरा कुनबा जोर-शोर से लगा है दीया, ग्वालिन, चुकनी, खिलौने और कलशा बनाने में। राजधानी को रोशन करने के लिए रांची के बोड़ेया स्थित सरपंच टोला के कुम्हार परिवार भी खूब मेहनत कर रहे हैं। अपने खून-पसीने से मिट्टी को गूंथकर, फिर उसे चाक पर दीये का आकार देकर हर रोज लाखों दीये बना रहे हैं। रांची के अधिकांश घरों में यहीं के बने दीये दिवाली की रात शमां को रोशन करेंगे। अभी ही व्यापारियों ने इनसे दीये की बुकिंग कर रखी है। कोई 5 हजार, कोई 10 हजार तो कोई 25 हजार दीये इनसे खरीदेगा।

सरपंच टोला के तेजू प्रजापति पिछले 50 साल से मिट्टी के दीये समेत अन्य सामान बनाते आ रहे हैं। इन्होंने उस दौर को भी देखा है, जब चाईनीज लाइटों ने कुम्हारों के धंधे को पूरी तरह चौपट कर दिया था। उस दौर में इन्होंने भी संघर्ष किया, लेकिन अपनी जमीन और परंपरा से जुड़े रहे। फिर वह समय भी आया जब मिट्टी के देसी दीये, कुल्हड़ और दूसरे सामानों की मांग फिर से होने लगी, लेकिन चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। इनके पूरे परिवार का संघर्ष जारी है। दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद उतनी भी आमदनी नहीं हो पाती कि ढंग की जिंदगी बिता सकें। बच्चों को अच्छे स्कूल में शिक्षा दिला सकें।

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मिट्टी के दीये और बर्तनों की घटती मांग और लगातार हो रहे घाटे को देखकर हजारों कुम्हारों ने अपना बिजनेस बदल दिया। वे कहते हैं कि इस धंधे में फायदा नहीं रह गया। पहले तो लागत बहुत कम लगती थी, लेकिन अब दीये से लेकर मिट्टी के बने हर सामान ग्राहकों को फैंसी चाहिए। ग्राहकों की डिमांड पूरी करने के लिए अब तो कुम्हारों को मिट्टी, अबरख, रंग, कोयला और पुआल सब कुछ खरीदना पड़ता है। 25 हजार की लागत लगाने और 24 घंटे कड़ी मेहनत करने के बाद कुम्हार लागत छोड़कर सिर्फ 20 हजार रुपये ही कमा पाते हैं।

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मेहनत तो कुम्हार करते हैं, लेकिन मुनाफा इनसे सामान खरीदकर बेचने वाले व्यापारी कमाते हैं। इनसे 40 रुपये और 70 रुपये सैकड़ा की दर से दीया खरीदकर व्यापारी उसे 100 से 250 रुपये सैकड़ा बेचते हैं। यही कारण है कि कुम्हार अपने पारंपरिक व्यवसाय से दूर हो रहे हैं। पहले जहां दिवाली के दीये बनाने को लेकर कुम्हार उत्साहित रहते थे। महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती थी, आज सिर्फ परंपरा के निर्वहन की औपचारिकता मात्र बच गई है। इनके जीवन में न उत्साह बचा है और न उमंग। तो आइये संकल्प करें कि इस बार हमारी दिवाली के साथ-साथ दीये बनाने वालों की दिवाली भी खुशियों से रोशन हो।

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