Khunti : पढ़ना भी है पढ़ाना भी जरूरी है, पर घोर दिक्कत है की बच्चे की भाषा टीचर को समझ नहीं आता और टीचर की भाषा बच्चे को। सब कुछ ऊपर से पार हो जाता। पढ़ाने वाले ज्यादातर टीचर हिन्दी में बोलते है। वहीं पढ़ने वाले बच्चे केवल मुंडारी भाषा जानते है। पूरे स्कूल में रजनीकांत मंडल ऐसे इकलौते टीचर है जिन्हें मुंडारी बोलना और पढ़ना आता है। बाकी टीचरों की पढ़ाई को समझाने के लिए स्कूल की रसोईया नन्दी बोदरा को क्लास रूम में आना पड़ता है। नन्दी हिन्दी का अनुवाद कर उसे मुंडारी भाषा में बच्चों को समझा जाती है। नन्दी का ज्यादातर समय क्लास रूम में ट्रांस्लेट करने में बीत जाता है। स्कूल में फिलहाल 40 बच्चे है। अपनी पूरी जिंदगी इस स्कूल में खपा देने वाले प्रभारी शिक्षक रजनीकांत का कहना है 2023 में वह रिटायर हो जाएंगे। उन्हें इस बात की चिंता अभी से खाई जा रही है की उनके रिटायरमेंट के बाद ना जाने बच्चों की पढ़ाई लिखाई कैसे होगी। 2006 तक मुंडारी भाषा के दो टीचर सामुएल पूर्ति व अर्चना कंडुलना मौजूद थे। इनके रिटायरमेंट के बाद कोई दूसरे टीचर यहां नहीं आये। वर्तमान में उनके अलावा एक अन्य टीचर माड़वारी साहू पदस्थापित है। इन्हें भी मुंडारी भाषा नहीं आती। बच्चे इन्हें समझ ही नहीं पाते। यह कहानी है राजकीकृत मध्य विद्यालय, तरगिया की। यह अजूबा स्कूल खूंटी के घोर नक्सल इलाका तोरपा प्रखंड की फटका पंचायत में है। मुंडारी भाषा के जानकार शिक्षक की बहाली को लेकर कई दफा तोरपा के प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी डोमन मोची को पत्र लिखा गया। नतीजा सिफर रहा। वहीं डोमन मोची कहते है की स्कूल से आये आवेदन को “ऊपर लेवल” पर भेज दिया गया है। तोरपा प्रखंड प्रमुख रोहित सुरीन ने कहा कि तरगिया स्कूल में जल्द से जल्द मुंडारी टीचर की बहाली हो ताकि बच्चे सहज तरीके से पढ़ लिख सके।
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