कोहराम लाइव डेस्क: कहा जाता है कि हसबैंड-वाइफ यानी पति-पत्नी का संबंध दोनों की सोच, समझ और भावना की कद्र की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। आपस में यकीन की कमी हुई, तो समझिए जीवन नर्क के अंधेरे में खोने लगेगा। दोनों को एक-दूसरे के सुख-दुख का दोस्त बनकर जीना ही दांपत्य की सफलता का राज है। मतभेद होना स्वाभाविक है, पर यह मनभेद तक न पहुंचे, इसका प्रयास दोतरफा होता है। दांपत्य जीवन के कई आयाम होते हैं। हर आयाम के तहत पति-पत्नी को हमेशा एक-दूसरे की जिंदगी की गाड़ी का सजग ड्राइवर बनकर ही दुर्घटना से एक-दूजे को सुरक्षित रखा जा सकता है। बुढा़पे का समय तो सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता होता है। इस समय पति-पत्नी को एक-दूसरे की देखरेख बच्चे की तरह करनी चाहिए।
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गांधीजी के जीवन की घटना
महात्मा गांधी के जीवन की एक घटना है। वे उस समय विदेश गए थे। उनके साथ पत्नी कस्तूरबा भी थीं। वहां गांधीजी के सम्मान में एक कार्यक्रम रखा गया था। जो व्यक्ति कार्यक्रम का संचालन कर रहा था, वह ये बात जानता था कि गुजराती में मां जैसी महिला को ‘बा’ कहा जाता है।मंच संचालक ने घोषणा की, ‘गांधीजी के साथ उनकी मां भी आई हुई हैं, हम उनका भी सम्मान करते हैं।’
वहां मौजूद लोग ये सुनकर घबरा गए। तुरंत मंच संचालक को एक चिट्ठी भेजी गई कि आपने गांधीजी की पत्नी को उनकी मां कह दिया है, भूल का सुधार करें। चिट्ठी देखकर संचालक भी घबरा गया।
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फिर गांधीजी के संबोधन की बारी आई। गांधीजी भी मजाकिया स्वभाव के थे। उन्होंने कहा, ‘मंच संचालक भाई ने भले ही संबोधन में गलती की है, लेकिन उनकी बात बिल्कुल सच है। उन्होंने बा को मेरी मां बताया है। सच तो ये है कि इस उम्र में कस्तूरबा मेरी देखभाल ठीक इसी तरह करती हैं, जैसे कोई मां अपने बच्चे की देखभाल करती हैं।’ इसके बाद कार्यक्रम में गांधीजी ने इस रिश्ते की व्याख्या बहुत अच्छे तरीके से की थी।
क्या मिलती है सीख
गांधीजी से जुड़ी ये घटना हमें संदेश दे रही है कि अगर पति-पत्नी बूढ़े हो गए हैं तो बच्चों की तरह ही एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए। शरीर थक चुका है, दोनों ने एकसाथ लंबी यात्रा की है, जैसे गांधीजी के साथ कस्तूरबा ने की थी। इससे दोनों के बीच प्रेम और समर्पण बना रहता है। यही सुखी दांपत्य का जीवन मंत्र है।
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