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हमको मेरा पति चाहिए भइया… बच्चा लोग को उसका पापा…

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रांची (सत्य शरण मिश्र/संजय कपरदार) : मुझे सिर्फ अपना हक चाहिए। बच्चों को चाहिए उनके पापा और मुझे चाहिए मेरा हसबैंड। साथ जीने मरने की कसम खाने वाला मेरा हसबैंड के नागेश्वर राव की लाइफ में एक औरत आयी और ऐसा डोरा डाला कि मेरे बंधन का डोर कमजोर पड़ गया। वह मुझे और बच्चों को छोड़ उस औरत का पल्लू थामे चला गया उसके साथ। हर संभव कोशिश की कि वो लौट आये, पर सब कोशिश बेकार गयी। उसने ऐसा जादू किया कि पलट कर देखता तक नहीं। खाने का खर्चा तक नहीं देता, बच्चों की पढ़ाई-लिखायी भी रुक गयी है। अपना हक पाने के इरादे से जगन्नाथपुर थाने में शिकायत दर्ज करायी है, पर पुलिस न हिलती है न डुलती है, सिर्फ कहती है, जब उनका मन भर जायेगा, लौट आयेंगे। धैर्य रखिए। यह कहना है के ईश्वरी का। गुजरे 16 साल के नागेश्वर राव क साथ दांपत्य जीवन बिताने के बाद आज वह बिल्कुल अकेली हो गयी हैं। उन्हें अपना कसूर तक याद नहीं कि आखिर क्यों बैरी हो गये बालम।

रेलवे में ही काम करने वाली एक औरत पर फिदा हो गया नागेश्वर

ईश्वरी बताती है कि 17 फरवरी 2005 को उनकी शादी श्रीकाकुलम (आंध्र प्रदेश) में के नागेश्वर राव से हुई। कुछ साल तक सबकुछ बढ़िया बीता, अचानक पति का बर्ताव बदल गया। बात-बात पर ताना देना, मारपीट करना, अत्याचार करना उसकी फितरत हो गयी। घर वाले और समाज के लोगों ने उन्हें काफी समझाया-बुझाया तब वह दोबारा ऐसा कुछ नहीं होगा, कह कर मेल मिलाप कर लिये। इसी बीच उनका ट्रांसफर रांची रेलवे (हटिया) पर हो गया। रेलवे में ड्यूटी जाने के क्रम में ही वहां काम करने वाली एक अन्य महिला से उसे इश्क हो गया और वह उसका ही होकर रह गया। घर आना जाना छोड़ दिया। इस बीच कोरोना को लेकर लॉकडाउन लग गया। लॉकडाउन में वह आसपास के मंदिरों और दूसरी जगहों से खाना लेकर अपने बच्चों का पेट भरा करती थी। उस बेअक्ल औरत के कारण ईश्वरी की जिंदगी में ही लॉकडाउन लग गया। वह अपने घर से कुछ ही दूरी पर उस औरत के साथ रहता, लेकिन एक बार भी अपने घर झांकने नहीं आता। बच्चों की दुहाई दी, हर तरह से मनाया, लेकिन उनकी मति मर चुकी है। इतना ही नहीं, अब श्रीकाकुलम में तलाक की अर्जी दे दी है। वह लाख कोशिश कर ले। मैं तलाक नहीं दूंगी। मुझे मेरा हसबैंड चाहिए। हक दिलाना समाज और कानून का काम है। उन पर मुझे भरोसा है। देखिए क्या बोल गये ईश्वरी और उनके बच्चे।

पिता की इस हरकत से बच्चों के सपने टूट गये हैं। बड़ा बेटा के ऋषभ कहता है कि बचपन से पता नहीं कि पापा का प्यार क्या होता है। उन्होंने मुझे कभी प्यार से देखा ही नहीं। कभी प्यार से सिर पर हाथ तक नहीं फेरा। पहले तो कभी-कभार घर आ जाया करते थे, लेकिन एक साल से हमें पूरी तरह छोड़ दिया है। छोटा बेटा के अनिमेष कहता है कि एक दिन पापा खूब शराब पीकर आये। हमलोग सो रहे थे। आते ही मुझे, भाई और मां को मारना शुरू कर दिया। घर में रखे पैसे और जेवर उठा लिये। हमने विरोध किया तो लोहे की रॉड से हमें मारा। मेरा सिर फूट गया। हम रो रहे थे, लेकिन उन्हें तरस नहीं आई। हमें छोड़कर चले गये। तब से अबतक घर नहीं लौटे।

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