Ranchi : झारखंड की मिट्टी में कहानियां हैं, जंगलों की सरसराहट में संगीत है, लोकगीतों में इतिहास है और आदिवासी जीवन में सिनेमा के अनगिनत रंग छिपे हैं। जरूरत बस इतनी है कि इन कहानियों को कैमरा मिले और इन आवाजों को बड़े पर्दे तक पहुंचने का रास्ता। इसी सोच के साथ झारखंड आदिवासी महोत्सव के दूसरे दिन सोमवार को मोरहाबादी मैदान स्थित वीर बुधु भगत सभागार में सिनेमा की दुनिया सजी। लघु और एनिमेशन फिल्मों की स्क्रीनिंग के साथ फिल्म निर्माण पर खास पैनल डिस्कशन हुआ, जिसमें झारखंड की अपनी सिनेमाई पहचान गढ़ने पर जोर दिया गया।
जब पर्दे पर उतरी झारखंड की अपनी कहानी
कार्यक्रम में PRD की ओर से निर्मित एनिमेशन फिल्म ‘XENO’ और ‘PRIYO AMI’ समेत कई फिल्मों की स्क्रीनिंग हुई। ‘PRIYO AMI’ का निर्देशन सुचना साहा ने किया है। वहीं, What Are You Searching, Look at the Sky और Tou-Tai जैसी फिल्मों को भी दर्शकों ने देखा। झारखंड की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को सामने लाने वाली फिल्मों ने कार्यक्रम में अलग रंग भर दिया। ‘Sohrai’ (हिंदी), ‘Miyad Arah Gaada’ (मुंडारी), ‘Gadi Lohardaga Mail’ (हिंदी) और ‘Aabua Paika Kabu Baegya’ (मुंडारी) जैसी फिल्मों ने यह संदेश दिया कि झारखंड की भाषाएं सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि यहां के सिनेमा की पहचान भी बन सकती हैं। पैनल डिस्कशन का संचालन चर्चित वेब सीरीज ‘पंचायत’ की कलाकार कल्पना खत्री ने किया। पैनल में फिल्म निर्माण से जुड़े इंद्रनील, निरंजन और सुदीप्तो शामिल रहे। बातचीत सिर्फ कैमरा और कहानी तक सीमित नहीं रही, बल्कि फिल्म बनाने की पूरी प्रक्रिया को लेकर युवाओं की जिज्ञासाओं के जवाब भी दिये गये।
कहानी कैसे चुनी जाये?
बिना फिल्म स्कूल गये फिल्म बनाई जा सकती है? प्राकृतिक रोशनी कितनी कारगर है? अभिनेता और निर्देशक के बीच तालमेल कैसे बने? OTT और फीचर फिल्म की एडिटिंग में क्या फर्क है? इन तमाम सवालों पर पैनलिस्टों ने अपने अनुभव साझा किये।
‘फिल्म बनाने के लिये डिग्री नहीं, अपनी कहानी की समझ जरूरी’
फिल्म निर्माण में प्रशिक्षण की भूमिका पर सुदीप्तो ने कहा कि अच्छी फिल्म बनाने के लिये हमेशा औपचारिक प्रशिक्षण जरूरी नहीं है। उनके मुताबिक तकनीकी प्रशिक्षण फिल्मकार की क्षमता जरूर बढ़ाता है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है अपनी कहानी को समझने की दृष्टि और उसे कहने का हुनर। ऐसे कई फिल्मकार रहे हैं, जिन्होंने संस्थागत प्रशिक्षण नहीं लिया, लेकिन अपनी संवेदना और जीवन को देखने के नजरिये से बेहतरीन फिल्में बनाई हैं।
प्राकृतिक रोशनी से LED तक… बदली फिल्म की दुनिया
फिल्मों में रोशनी के इस्तेमाल पर भी दिलचस्प चर्चा हुई। पैनलिस्टों ने बताया कि किसी दृश्य में प्राकृतिक प्रकाश इस्तेमाल करना है या कृत्रिम रोशनी,यह पूरी तरह कहानी और निर्देशक की रचनात्मक जरूरत पर निर्भर करता है। पहले बड़े-बड़े लाइटिंग उपकरण फिल्म निर्माण का अहम हिस्सा हुआ करते थे। गर्मी और बिजली की खपत भी ज्यादा होती थी। अब LED लाइट ने शूटिंग को काफी आसान बना दिया है। फिर भी प्राकृतिक रोशनी की अपनी एक अलग खूबसूरती है। तकनीक रास्ता दिखा सकती है, लेकिन दृश्य को खूबसूरत बनाने वाली असली चीज फिल्मकार की नजर होती है। फिल्म में भावनाओं की सीमा पर पूछे गये सवाल का जवाब पैनलिस्टों ने बड़े ही सहज अंदाज में दिया। उन्होंने भावनाओं की तुलना खाने के मसाले से करते हुये समझाया कि जैसे किसी व्यंजन में हर मसाला सही मात्रा और सही समय पर डालना जरूरी है, वैसे ही सिनेमा में भी इमोशन की सही मात्रा जरूरी है। किसी दृश्य का असर सिर्फ अभिनेता के अभिनय से नहीं बनता। निर्देशन, एडिटिंग, कलर, साउंड, म्यूजिक और दर्शक की मनोदशा, सब मिलकर उस पल को असरदार बनाते हैं। भावना जरूरी है, लेकिन भावना की अति कहानी को बोझिल भी कर सकती है।
‘अपनी मिट्टी की महक वाली कहानी कहना चाहता हूं’
कहानी और स्क्रिप्ट के चयन पर निरंजन ने कहा कि उन्हें वही विषय आकर्षित करते हैं, जो उन्हें भीतर से प्रभावित करते हैं। झारखंड की संस्कृति, समाज और अपनी जमीन से जुड़े अनुभव उनकी रचनात्मकता का आधार हैं। उन्होंने कहा कि वह ऐसी कहानियां लिखना और प्रोड्यूस करना पसंद करते हैं, जिनमें अपनी मिट्टी की महक हो। कुरुख जैसी क्षेत्रीय भाषाओं और आदिवासी जीवन से जुड़े विषयों को सिनेमा में जगह देना उनके काम का अहम हिस्सा है।
अभिनेता और निर्देशक की दोस्ती से निखरता है किरदार
अभिनेता के मूड और उसकी क्षमता को समझने के सवाल पर पैनलिस्टों ने कहा कि निर्देशक और कलाकार के बीच यह समझ एक दिन में नहीं बनती। इसकी शुरुआत कास्टिंग से होती है। अभिनेता की ऊर्जा, व्यक्तित्व और अभिव्यक्ति को समझने के बाद निर्देशक तय करता है कि किस भूमिका में उससे बेहतर काम लिया जा सकता है। फिर शूटिंग के दौरान लगातार संवाद इस रिश्ते को और मजबूत करता है। जब निर्देशक की नजर और अभिनेता की संवेदना एक सुर में आ जाये, तो किरदार पर्दे पर सिर्फ दिखाई नहीं देता, जीता हुआ महसूस होता है।
OTT की रफ्तार, फीचर फिल्म का ठहराव
OTT और फीचर फिल्मों की एडिटिंग पर भी चर्चा हुई। पैनलिस्टों के मुताबिक OTT में दर्शक का ध्यान लगातार बनाये रखना बड़ी चुनौती है। कट, साउंड और म्यूजिक का इस्तेमाल इसलिए अलग तरीके से किया जाता है। वहीं फीचर फिल्म दर्शक को लंबे सिनेमाई अनुभव में लेकर चलती है। यहां कहानी, अभिनय, कैमरा, लाइटिंग, एडिटिंग, साउंड और म्यूजिक को एक समग्र अनुभव के रूप में गढ़ा जाता है। यानी माध्यम बदलता है तो कहानी कहने की चाल भी बदल जाती है।
झारखंड की भाषाओं में छिपा है बड़ा सिनेमाई खजाना
पैनल में सबसे अहम बात यही उभरकर सामने आई कि झारखंड की क्षेत्रीय भाषाएं, लोककथाएं, आदिवासी जीवन, प्रकृति, इतिहास और समकालीन सरोकार यहां के सिनेमा को एक अलग पहचान दे सकते हैं। मुंडारी, कुरुख समेत स्थानीय भाषाओं में फिल्में बनेंगी तो सिर्फ संस्कृति सुरक्षित नहीं होगी, बल्कि स्थानीय कलाकारों, लेखकों, निर्देशकों, तकनीशियनों और दूसरे हुनरमंदों के लिए नए अवसर भी खुलेंगे। वक्ताओं ने कहा कि झारखंड को मजबूत फिल्म हब के रूप में विकसित करने के लिये स्थानीय प्रतिभाओं को प्रशिक्षण, तकनीकी संसाधन, वित्तीय सहयोग और फिल्मों के प्रदर्शन के मंच उपलब्ध कराने होंगे। क्योंकि कहानी यहां कम नहीं है। कमी है तो उसे दुनिया तक पहुंचाने वाले मंच की। आखिर में बात इतनी सी, झारखंड को अपनी सिनेमाई पहचान के लिये किसी और की कहानी उधार लेने की जरूरत नहीं। यहां जंगल हैं, पहाड़ हैं, लोकगीत हैं, संघर्ष हैं, प्रेम है, परंपराएं हैं और बदलते समय की नई कहानियां भी। जरूरत है इन्हें कैमरे की नजर देने की। जिस दिन झारखंड अपनी मिट्टी की कहानी अपनी भाषा में खुद कहेगा, उस दिन सिनेमा के नक्शे पर उसकी पहचान सिर्फ एक लोकेशन नहीं, बल्कि एक अलग आवाज होगी।



















