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जो सहता है, वही लहता है… क्या गजब का कर गये कमाल, देखिए…

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रांची (सत्य शरण मिश्र/श्रद्धा छेत्री) : कोई देख नहीं पाता, कोई बोल नहीं पाता, कोई चलने फिरने से है लाचार, फिर भी उनसे भारी जिन्हें ये सबकुछ कुदरत ने दे रखा है। मन कचोटता जरूर है, क्योंकि लोग इन्हें इनके नाम से नहीं, इनकी ‘लाचारी’ में मिले नाम से पुकारते हैं। घरवाले अलग से कोसते रहते थे। घर से बाहर निकलते ही बच्चो तक चिढ़ाते थे-कोई कहता था, ऊ देख लंगड़ा के, ऊ देख अंधरा के… शाम घिरती थी तो सभी एक जगह जुटते थे और अपना-अपना दुखड़ा सुनाते थे। कभी कभी मन करता था, ऐसी जिंदगी जीने से बेहतर है खुद को मिटा लें। लेकिन कहते हैं न जो सहता है, वही लहता है। वहीं अगर ठान लो तो जीत, मान लो तो हार। बस इन्होंने भी यही कर दिखाया। ठाना और कर दिखाया ऐसा कि अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना डाला। ब्लॉक से लेकर डीएसओ दफ्तर तक लगायी दौड़-धूप और खुल गयी उनकी राशन की एक दुकान। सबके अलग-अलग काम। जैसी क्षमता वैसे काम आपस में ही बांट लिया। कोई नाप-जोख करता है, कोई बोरा खोलता है, कोई हिसाब संभालता है। अब तो गांव के 135 परिवारों के घर तक इनकी दुकान से राशन।

ओरमांझी के बारीडीह गांव में रहने वाले रामेश्वर महतो का दुख यह है कि वे देख नहीं पाते। लोगों के उलाहनों से ऊब कर अपनी एक टीम बनायी। उस टीम में वैसे लोगों को जोड़ा जो कुछ न कुछ ‘शरीर से अधूरे और लाचार’ थे। बन गयी 10 लोगों की टीम। किसी ने इन्हें बताया कि राशन दुकान का लाइसेंस लेने के लिए टेंडर निकला है। सब भागे-भागे पहुंचे ब्लॉक और ले आये आवेदन। पकड़े एक ऐसे जानकार को जिसने उनके आवेदन को भरा। इन्हें तब करारा झटका लगा जब कुछ अधिकारियों ने डांट टपट कर भगा दिया। पर ये हिम्मत कहां हारने वाले थे। पहुंच गये निःशक्तता आयुक्त के दफ्तर। उनकी कलम क्या चली, इन 10 लोगों की तकदीर ही बदल गयी। मिल गयी एक ही दिन में राशन की दुकान। आपस में तालमेल ऐसा कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं। रामेश्वर लेखा-जोखा रखते हैं। चलने से लाचार बलवंत अंगूठा (ई-पोस मशीन) लगवाता है। नहीं देख पाने वाला घुमेश्वर और सुंदरनाथ महतो बोरा से राशन निकाल रखते हैं तराजू पर और तौल देखता है आँख वाला बलवंत। सबने अपना-अपना शिफ्ट भी बांट रखा है। दुकान नहीं होने देते हैं किसी दिन बंद। हमेशा तीन लोग दुकान में मौजूद रहते हैं। कल तक उलाहना, कोसने और चिढ़ाने वाले मुख से यही शब्द निकलते हैं-गजब का किया कमाल। सबके हो गये दुलारे। सुंदरनाथ और बलवंत कहते हैं एक राशन दुकान ने उनकी ‘वैल्यू’ बढ़ा दी। अब उनके बच्चे भी पढ़ते हैं प्राइवेट स्कूल में। मन को बड़ा सुकून मिलता है। आइए, देखें और सुनें इन्हें…

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